भास्कर न्यूज | टिटिलागढ़ राज्यसभा में सांसद निरंजन बिशी ने ओडिशा की आदिवासी भाषाओं कोशली, संबलपुरी, सउरा, कुई, हो, मुंडारी और भूमिज को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की सशक्त मांग उठाई। बिशि ने कहा कि मातृभूमि, मातृभाषा और मातृसंस्कृति किसी भी जाति की पहचान और राष्ट्र की संपदा हैं। उन्होंने याद दिलाया कि पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने भी इन भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने की सिफारिश केंद्र सरकार से की थी। उन्होंने बताया कि पश्चिमी ओडिशा के लगभग दो करोड़ लोग कोशली (संबलपुरी) बोलते हैं। बलांगीर, बरगढ़, देवगढ़, झारसुगुड़ा, सुंदरगढ़, संबलपुर, कालाहांडी, नुआपड़ा, सोनपुर, बौद्ध और आंठमलिक क्षेत्रों में यह भाषा व्यापक रूप से प्रचलित है। ऐतिहासिक रूप से यह क्षेत्र कोशल राज्य का हिस्सा रहा है, इसलिए यहां कोशली भाषा की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि मातृभाषा में पढ़ाई, लेखन और प्रतियोगी परीक्षाओं में मौखिक उत्तर देने के लिए इन भाषाओं को संवैधानिक मान्यता देना अनिवार्य है। सांसद ने बताया कि लगभग 15 लाख आदिवासी समुदाय जैसे शबर, सउरा, लांजिया सउरा, जारा शबर, किरात शबर, बिराट शबर आदि सउरा भाषा बोलते हैं। इसी तरह कुई भाषा कंध, डोंगरिया कंध, राजा कंध, बुड़ा कंध और सीता कंध समुदायों में प्रचलित है। उन्होंने कहा कि मुंडारी भाषा महान आदिवासी नेता भगवान बिरसा मुंडा की मातृभाषा थी, और इस भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। इसके अतिरिक्त उन्होंने भूमिज और हो भाषाओं की महत्ता पर भी प्रकाश डाला और बताया कि ओडिशा का किस विश्वविद्यालय आदिवासी छात्रों को उनकी मातृभाषाओं हो, मुंडारी, भूमिज, सउरा, कुई, संथाली, अलचिकी और गोंडी में शिक्षा प्रदान कर रहा है।


