1350 बीघा जमीन अधिग्रहण को लेकर संघर्ष जारी:16 साल से विवादों में अटकी नींदड़ आवासीय योजना, मुआवजे पर सरकार-किसानों में सहमति नहीं

नींदड़ आवासीय योजना का विवाद पिछले 16 साल से सुलझ नहीं पाया है। जमीन अधिग्रहण और मुआवजे को लेकर सरकार, जेडीए और प्रभावित किसानों के बीच कई बार बैठकें हुईं, लेकिन सहमति के बिंदुओं पर आज तक अमल नहीं हो सका। जेडीए ने नींदड़ आवासीय योजना के लिए 1350 बीघा जमीन अधिग्रहण का अवॉर्ड पहले ही जारी कर कोर्ट में मुआवजे की राशि जमा करवा रखी है। इसके बावजूद जब भी कब्जा लेने की कोशिश की जाती है, प्रभावित किसानों के विरोध के चलते प्रक्रिया अटक जाती है। योजना के प्रवेश मार्ग के लिए सीकर रोड की ओर 15 बीघा जमीन का कब्जा लेकर करीब आधा किलोमीटर लंबी और 200 फीट चौड़ी ग्रेवल सड़क बनाई गई, लेकिन इसके आगे जमीन अधिग्रहण नहीं हो पाने से पूरा प्रोजेक्ट ठप पड़ा है। प्रभावितों की प्रमुख मांगें किसानों का कहना है कि जेडीए ने 2010-11 में पुराने 1894 भूमि अधिग्रहण कानून के तहत प्रक्रिया शुरू की, जबकि वे 2013 के नए भूमि अधिग्रहण कानून के तहत मुआवजा चाहते हैं। आरोप है कि 2010 की डीएलसी दरों (करीब 30 लाख रुपये प्रति बीघा) के आधार पर मुआवजा तय किया जा रहा है, जो वर्तमान बाजार मूल्य से काफी कम है। योजना क्षेत्र में करीब 120-150 बीघा जमीन मंदिर माफी की है, जिस पर लंबे समय से लोग बसे हुए हैं। वहां रहने वालों का कहना है कि उन्हें बेघर करना न्यायसंगत नहीं है। नींदड़ योजना का मुख्य विवाद; 1350 बीघा कृषि भूमि के जबरन अधिग्रहण और मुआवजे की दरों को लेकर है। नगरीय विकास मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने प्रभावित किसानों को एक साल के भीतर विकसित भूखंड देने का दावा किया था। इसी क्रम में पिछले साल जेडीए ने कुछ किसानों को आरक्षण पत्र भी जारी किए, लेकिन इसके बावजूद एक अन्य गुट अपनी मांगों पर अड़ा हुआ है, जिससे संघर्ष समिति तीन हिस्सों में बंट गई है। जेडीए ने दुबारा सर्वे कर 26 किसानों को आरक्षण पत्र जारी किए थे; पिछले साल जेडीए ने दोबारा सर्वे कर खातेदारों से सहमति के बाद 26 किसानों से 15 बीघा जमीन अधिग्रहित की थी और उन्हें 25 प्रतिशत विकसित भूमि के आरक्षण पत्र जारी किए गए थे। फिलहाल जेडीए के पास योजना क्षेत्र में करीब 40 हेक्टेयर जमीन उपलब्ध है।

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