हरदा राजस्थान के बीकानेर में खेजड़ी बचाने के लिए चल रहे आंदोलन के समर्थन में हरदा में भी विश्नोई समाज आगे आया है। गुरुवार को शहर के वीर तेजाजी चौक पर समाज के लोगों ने एक दिवसीय उपवास शुरू किया। इसमें विश्नोई समाज के साथ-साथ अन्य समाजों के लोगों ने भी अपना समर्थन दिया। विश्नोई समाज युवा संगठन के प्रदेशाध्यक्ष लोकेश विश्नोई ने बताया कि जिस प्रकार बीकानेर में 363 संतों सहित लोगों द्वारा अनशन-धरना दिया जा रहा है, उसी के समर्थन में हरदा में 29 लोग धरना स्थल पर उपवास पर बैठे हैं। समाज के बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग अपने-अपने घरों पर रहकर इस आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं। क्या है पूरा विवाद समझिए असल में, इस पूरे विवाद की वजह पश्चिमी राजस्थान में चल रहे सोलर पावर प्रोजेक्ट हैं। राजस्थान का राज्य वृक्ष खेजड़ी, जिसे “रेगिस्तान की जीवनरेखा” कहा जाता है, बड़ी संख्या में काटा जा रहा है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि बीकानेर संभाग में विकास के नाम पर हजारों खेजड़ी के पेड़ काट दिए गए। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई जगहों पर पेड़ काटने के बाद सबूत मिटाने के लिए उन्हें रात के अंधेरे में जमीन में गाड़ दिया गया। इस तरह की शिकायतें भी सामने आई हैं। खेजड़ी की इस कथित अवैध कटाई से बिश्नोई समाज और पर्यावरण से जुड़े लोग गुस्से में हैं। उनका कहना है कि इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान पहुंच रहा है, बल्कि उनकी धार्मिक और सांस्कृतिक आस्था भी आहत हो रही है। इसी वजह से उनका विरोध अब आंदोलन का रूप ले चुका है। उग्र आंदोलन की चेतावनी
धरना स्थल पर समाज के लोगों ने हवन कुंड में आहुतियां छोड़ीं। संतों के साथ कई भक्तों ने भोजन त्यागने का निर्णय लिया। बीकानेर में अनशन पर बैठे संतों ने सरकार को 24 घंटे का अल्टीमेटम दिया है कि यदि ‘ट्री एक्ट’ पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो आंदोलन उग्र होगा। समाज के लोगों का कहना है कि वे गुरु जंभेश्वर के 29 नियम मानने वाले हैं। वे मर जाएंगे, मिट जाएंगे पर गलत नहीं होने देंगे। यह अनशन 36 कौम के हित के लिए किया जा रहा है। पूरे दिन चलेगा आंदोलन
गुरुवार सुबह आठ बजे से शुरू हुआ उपवास रात आठ बजे तक चलेगा। शाम पांच बजे खेजड़ी को बचाने के लिए एसडीएम को ज्ञापन सौंपा जाएगा। विश्नोई समाज का कहना है कि खेजड़ी को बचाने के लिए किया जा रहा यह अनशन किसी एक वर्ग या समाज के लिए नहीं, बल्कि मानव समाज के हितों को ध्यान में रखकर किया जा रहा है। यह केवल पेड़ बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि उनकी धार्मिक विरासत को बचाने का संकल्प है।


