बच्चों में खांसी रहना, बुखार रहना, वजन कम होने के लक्षणों की अनदेखी नुकसानदायक हो सकती है। अगर बच्चों में इस तरह के लक्षण हो रहे हैं और अन्य जांच में कुछ क्लियर नहीं हो पा रहा तो यह पीडियाट्रिक टीबी के लक्षण हो सकते हैं। ऐसे में समय पर जांच, इलाज और बचाव से इस समस्या से हल पाया जा सकता है। जिले में भी टीबी के मामले सामने आ रहे हैं। इसमें अहम कारण पैरेंट्स द्वारा समय पर जांच न करवाने के कारण उनके संपर्क में आने पर बच्चे प्रभावित हो जाते हैं। कुल आबादी में से 10-12 फीसदी बच्चों में पीडियाट्रिक टीबी के मामले देखने को मिल रहे हैं। इनमें 18 साल तक की उम्र के केस को पीडियाट्रिक टीबी में रखा जाता है। चिकित्सा माहिरों का कहना है कि बच्चों में जांच कर इसकी पहचान करने के बाद समय पर इलाज शुरू हो जाए तो बचाव संभव है। बच्चों में टीबी का इलाज 1 साल तक चलता है जिले में 6000 से ज्यादा टीबी के मरीज हैं जिनका सरकारी संस्थानों में इलाज चल रहा है। इनमें से 8 फीसदी मामले पीडियाट्रिक टीबी के हैं। बच्चों के बलगम की जांच, एक्स-रे में भी कई बार पता नहीं चल पाता। ऐसे में बच्चों के सैंपल लेने के लिए भी अलग निर्देश हैं जिससे कि सही जांच और इलाज हो सके। ज्यादा भीड़ वाली जगहों, सब-अर्बन इलाकों में ज्यादा केस देखने को मिलते हैं। एक्सपर्ट्स के अनुसार आमतौर पर टीबी का इलाज 6 महीने तक चलता है। लेकिन बच्चों में कई बार फेफड़ों के अलावा अन्य अंग भी प्रभावित हो जाते हैं तो ऐसे में उनका इलाज नौ महीने से लेकर एक साल तक भी इलाज चलता है। बच्चों की इम्युनिटी कम होने के कारण पांच साल से कम उम्र के बच्चे ज्यादा प्रभावित होते हैं। हालांकि सरकार द्वारा टीबी के मरीजों के लिए निक्षय पोषण योजना के तहत एक हजार की राशि उनके अकाउंट में भेजी जाती है। यह राशि सभी मरीजों के लिए जारी होती है। वहीं, टीबी के लिए मुफ्त दवाई भी मिलती है। बावजूद इसके भी जांच में देरी या अनदेखी की जाती है।


