राजस्थान के बीकानेर में राज्य वृक्ष खेजड़ी को बचाने के लिए आंदोलन किया जा रहा है। आम आदमी से लेकर संत आमरण अनशन पर बैठे। इस आंदोलन के बाद खेजड़ी को लेकर भी देशभर में उत्सुकता बढ़ी है। आखिर क्यों खास है खेजड़ी और इसे बचाने के लिए के लिए लोगों ने क्या-क्या किया है? आज की रिपोर्ट में एक ऐसे किसान की बात जिसने अपनी उपजाऊ सैकड़ों बीघा जमीन पर खेजड़ी का जंगल ही बसा दिया। यहां खेजड़ी के साथ वन्य-जीव और मवेशी भी रहने लगे हैं। पढ़िए रेगिस्तान में हरियाली की उम्मीद की ये कहानी… जालोर जिले के सायला में स्थित हरमू गांव में पाबूदान की ये दूसरी पीढ़ी है। पाबूदान अब अपनी कहानी बताने के लिए इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन, उनके पोते चदनादान ने शुरू से दादा पाबूदान और पिता मुराददान का खेजड़ी के प्रति प्रेम देखा। वे अपने दादा के शब्द बने और ये कहानी बताते हैं… ‘हम खेजड़ी के रखवाले’ चदनादान कहते हैं- मेरे पिता मुरादादान किसान हैं, उनके पिता यानि मेरे दादा पाबूदान ने 1998 में खेजड़ी के जंगल लगाना शुरू किया था। हमारी दूसरी पीढ़ी इस खेजड़ी की सुरक्षा कर रही है। 300 बीघा जमीन पर आपको खेजड़ी के सिवा कुछ नहीं मिलेगा। यहां दादा ने 6000 से ज्यादा खेजड़ी और नीम के पेड़ लगाए हैं। जिनके आसपास नील गाय, हिरण और वन्य-जीव नजर आते हैं। दादा ने खेजड़ी का जंगल बसा दिया चादनदान कहते हैं- मारवाड़ की तुलसी (खेजड़ी) आज गंभीर संकट में है। सोलर प्लांट्स और शहरीकरण के दबाव के कारण खेजड़ी के पेड़ तेजी से कट रहे हैं और मरुस्थल से हरियाली धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। मेरे दादा ने खेजड़ी के पेड़ का जंगल बना दिया। आज हम ही इसकी रखवाली करते हैं। खेजड़ी के प्रत्येक पेड़ से एक साल में एक ट्रोली पत्ते प्राप्त होते हैं। जिससे जैविक खाद बनती हैं। ये मारवाड़ की ‘तुलसी’ सिर्फ पूजी जा सकती है मुराददान बताते हैं- हमारे परिवार ने पिछले 17 सालों से इस जमीन पर कोई खेती नहीं की है। जबकि ये धरती अनार, सरसों और अरंडी की अच्छी खेती के लिए जानी जाती है। पिता (पाबूदान) कहते थे कि राजस्थान की खेजड़ी तो मारवाड़ की तुलसी है और तुलसी को काटा या खत्म नहीं किया जाता। सम्मान दिया जाता है और पूजा जाता है। किसान मुरारदान बताया कि हमने अपने खेत में 5 हजार से अधिक खेजड़ी के पेड़ लगाए हैं। जिन्हें संस्कृत में ‘समी’ कहा जाता है। 17 साल कुछ नहीं उगाया मुराददान बताते हैं- इन पेड़ों को लगाने का उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण नहीं है, बल्कि जंगली जीव-जंतु और पक्षियों के लिए सहारा देना भी है। इनकी छांव में वे आराम से बैठ सकते हैं। हमारे खेत में शिकार करना भी मना है। इन पेड़ों की देखभाल और इन्हें बड़ा करने के लिए हमने बच्चे की तरह इनका ध्यान रखा। 17 साल तक 300 बीघा में कुछ नहीं उगाया। अगर फसल बो देते तो खेजड़ी नहीं उग पाती। हमें आर्थिक स्थिरता के साथ पर्यावरण का भी ध्यान रखना था। अब खेजड़ी के पास फसल करेंगे मुरारदान बताते हैं खेजड़ी एक बार बड़ी हो जाए तो केवल पर्यावरण के लिए ही नहीं, बल्कि खेती के लिए बहुत फायदेमंद है। इसकी जड़ें मिट्टी की नमी बनाए रखती हैं। इससे आसपास की फसलें अधिक उपज देती हैं। इसके पेड़ के नीचे कई प्रकार की जैविक फसलें उगाई जा सकती हैं, जो किसानों के लिए वरदान साबित होती हैं। मुरारदान कहते हैं- हम केवल अपने खेत तक सीमित नहीं रहे, हमने पूरे हरमू गांव और आसपास के इलाकों में जागरूकता अभियान चलाया। ताकि अन्य किसान भी खेजड़ी के महत्व को समझें और इसे संरक्षण दें। ये सस्टेनेबल फार्मिंग की नई सोच है, जिसे किसानों को अपनाना चाहिए। राजस्थान सरकार कर चुकी सम्मानित जयपुर में सरकार की ओर से 27 जुलाई 2025 को आयोजित 76वां राज्य स्तरीय वन महोत्सव में उन्हें सम्मानित किया था। मुराददान को वन विकास, संरक्षण एवं वन सुरक्षा अमृता देवी विश्नोई की स्मृति पुरस्कार देकर सम्मानित किया। वह बताते हैं, उन्हें ग्रीन आइकन अवॉर्ड, पर्यावरण मित्र सम्मान जैसे पुरस्कार मिल चुके हैं। इसके साथ ही वह करीब जिला स्तरीय पर 15 बार सम्मानित हो चुके हैं। …. खेजड़ी से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… जूस पीकर अनशन तोड़ा, कुछ देर बाद फिर बैठै:बोले-ऑर्डर अधूरा है; विधानसभा में सीएम ने कहा- खेजड़ी संरक्षण के लिए कानून बनेगा बीकानेर में चल रहे ‘खेजड़ी बचाओ’ आंदोलन चौथे दिन मंत्री केके विश्नोई ने अनशन पर बैठे लोगों को जूस पिलाकर अनशन तुड़वाया। कुछ देर बाद लोग फिर अनशन पर बैठ गए। पूरी खबर पढ़िए…


