भारत ने अप्रवासियों को लेने अपना प्लेन क्यों नहीं भेजा:कोलंबिया ने लौटाया था अमेरिकी विमान; ट्रम्प को नाराज न करने के 4 कारण

तारीख- 5 फरवरी जगह- अमृतसर का मिलिट्री एयरबेस अमेरिकी वायुसेना का एक C-17 ग्लोबमास्टर विमान 104 अवैध भारतीय अप्रवासियों को लेकर एयरबेस पर उतरा। इन सभी के हाथों में हथकड़ी और पैरों में चेन बंधी थी। भारतीयों के साथ इस बर्ताव पर संसद तक में हंगामा हुआ। विपक्ष ने आरोप लगाया कि भारतीयों को आतंकी की तरह लाया गया। सरकार को कोलंबिया से सीख लेने की नसीहत दी। दरअसल, अमेरिका ने 26 जनवरी को कोलंबियाई नागरिकों को हथकड़ी लगाकर भेजा था, लेकिन कोलंबियाई राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने अमेरिकी विमान को देश में उतरने की इजाजत नहीं दी। उन्होंने कहा कि अमेरिका में रह रहे कोलंबियाई नागरिक अपराधी नहीं हैं। उनके साथ गरिमा से पेश आना चाहिए। इसके बाद कोलंबिया अपने प्लेन से उन्हें वापस लाया। अब सवाल यह है कि जब कोलंबिया जैसा छोटा देश अमेरिका के सामने सख्ती दिखा सकता है, तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर पाया। वजह समझने के लिए हमने 2 एक्सपर्ट से बात की। भारत के सॉफ्ट रवैये की 4 संभावित वजह… 1. मोदी के अमेरिका दौरे से पहले विवाद नहीं चाहता था भारत विदेश मामलों के जानकार और JNU के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं- भारत ट्रम्प के इस रवैये पर खामोश रहा, क्योंकि 10 दिन बाद ही पीएम मोदी की उनसे मुलाकात होनी थी। भारत बयान देकर कोई नया विवाद नहीं खड़ा करना चाहता था। इससे ट्रम्प-मोदी मुलाकात के रद्द होने का खतरा था। वही इस मामले पर JNU में प्रोफेसर ए.के. पाशा कहते हैं- PM मोदी ट्रम्प प्रशासन के खिलाफ बोलने से परहेज कर रहे हैं, क्योंकि वे ट्रम्प के साथ दोस्ती को मजबूत करना चाहते हैं। भारत दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के साथ संबंध खराब नहीं करना चाहता है। इंडियन वर्ल्ड काउंसिल के सीनियर रिसर्च फेलो फज्जुर रहमान सिद्दीकी के मुताबिक भारत, ट्रम्प प्रशासन के शुरुआती दौर में ही रिश्ते नहीं बिगाड़ना चाहता है। भारत के कोलंबिया की तरह एक्शन नहीं लेने की वजह भौगोलिक और राजनीतिक स्थिति भी है। कोलंबिया एक छोटा देश है, उसकी अमेरिका से आर्थिक और रक्षा जरूरतें भारत से पूरी तरह अलग हैं। भारत की बड़ी आबादी अमेरिका में रहती है। भारत अपनी विदेश नीति में दूसरों के मुकाबले ज्यादा आक्रामक रुख नहीं दिखाता है। 2. अमेरिका के साथ टैरिफ वॉर नहीं चाहता भारत ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनने के 10 दिन बाद मेक्सिको और कनाडा पर 25% टैरिफ लगाने का आदेश दिया था। ट्रम्प का आरोप था कि इन देशों की सरकारें अवैध अप्रवासियों पर सख्ती नहीं बरतती हैं। दरअसल, अवैध अप्रवासी इन दोनों देशों के बॉर्डर से अमेरिका में दाखिल होते हैं। अवैध अप्रवासियों के मुद्दे को लेकर ही ट्रम्प ने कोलंबिया पर भी 25% टैरिफ लगाया था। प्रो. राजन कुमार के मुताबिक मोदी सरकार नहीं चाहती कि इस मुद्दे पर ट्रम्प प्रशासन भारत पर टैरिफ लगाए। ट्रम्प 4 फरवरी को चीन पर 10% टैरिफ लगा चुके हैं। इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका पर 15% टैरिफ लगा दिया है। अमेरिका-चीन के बीच इस टैरिफ वॉर को भारत अवसर के रूप में देख रहा है। चीन के सामान अमेरिका में महंगे होने पर वहां भारतीय सामान की डिमांड बढ़ सकती है। साल 2023 में चीन ने अमेरिका को 427 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सामान भेजा था। वहीं, भारत ने अमेरिका को 83.77 बिलियन अमेरिका डॉलर का निर्यात किया था। चीन ने भारत की तुलना में अमेरिका को 5 गुना से ज्यादा निर्यात किया है। ऐसे में भारत, अमेरिका को अपना निर्यात बढ़ा सकता है। 3. अमेरिका एकमात्र बड़ा साझेदार, जिससे कारोबार में घाटा नहीं भारत से सामान आयात करने वाले टॉप 10 देशों में अमेरिका एकमात्र देश जिससे भारत का व्यापार घाटा नहीं हैं। 2023-24 में दोनों देशों के बीच 118 अरब डॉलर से ज्यादा का व्यापार हुआ था। इसमें भारत का ट्रेड 37 अरब डॉलर सरप्लस में रहा था। जबकि भारत को अपने बाकी 9 देशों के साथ व्यापार घाटा का सामना करना पड़ा था। भारत के मुकाबले कोलंबिया का अमेरिका से व्यापार आधे से कम है। दोनों देशों के बीच 2023 में 33.8 अरब डॉलर का व्यापार हुआ। जिसमें अमेरिका का व्यापार घाटा 1.6 अरब डॉलर ही था। प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक अमेरिका और भारत के संबंधों में ट्रेड अहम मुद्दा है। आर्थिक के साथ-साथ हमारे संबंध सांस्कृतिक और राजनीतिक तौर पर भी काफी महत्वपूर्ण हैं। अमेरिका के साथ हमारा व्यापार लंबे समय से भारत के लिए फायदेमंद रहा है। 4. चीन को काउंटर करने के लिए मजबूत साझेदार की जरूरत प्रोफेसर राजन कुमार के मुताबिक ट्रम्प शुरुआत से ही अनप्रिडिक्टेबल रहे हैं। भारत और चीन के रिश्ते में पहले से ही तनाव है, ऐसे में भारत नहीं चाहता है कि अमेरिका के साथ रिश्तों में तनाव आए। वर्तमान हालात में भारत को मजबूत साझेदारों की जरूरत है। भारत उत्तर और उत्तर-पूर्वी सीमा पर पहले ही चीन की चुनौती का सामना कर रहा है। इसके साथ ही इंडो-पेसिफिक क्षेत्र में भी उसे चीन से चुनौती मिल रही है। भारत का पारंपरिक सहयोगी रूस, यूक्रेन के साथ जंग में उलझा हुआ है। इससे भारत को मिलने वाले हथियारों की सप्लाई पर असर पड़ा है। बदलते वर्ल्ड ऑर्डर और नई जियो पॉलिटिकल चुनौतियों के बीच भारत को मजबूत साझेदारों की जरूरत है। ऐसे में भारत हथियारों के लिए अब नए रास्ते तलाश रहा है। पिछले महीने ही ट्रम्प ने भारत से और ज्यादा अमेरिकी हथियार खरीदने के लिए कहा था। भारत पहले से ही अमेरिका से 4 अरब डॉलर के 31 ड्रोन खरीदने की प्रोसेस में है। इसके अलावा भारत ने 114 फाइटर जेट खरीदने के ग्लोबल टेंडर जारी किया है। मोदी ट्रम्प की मुलाकात में इस पर चर्चा हो सकती है। भारत एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल सिस्टम से लैस 100 स्ट्राइकर प्लेन खरीदेगा और बाद में एक सरकारी कंपनी के जरिए उनका को-प्रोडक्शन करेगा।

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