करंट से झुलसे अंग माइक्रोसर्जिकल फ्री-फ्लैप रिकंस्ट्रक्शन से बचेंगे:प्रभावित अंग बचाने लगाते हैं शरीर की ही हड्‌डी, एम्स भोपाल ने 23 मरीजों का किया इलाज

हाई-वोल्टेज बिजली की चपेट में आने के बाद गंभीर रूप से झुलस जाना कई बार जिंदगी भर की अपंगता या अंग कटने तक की वजह बन जाता है। ऐसे मुश्किल हालात में मरीज और उनके परिजन अक्सर उम्मीद खो बैठते हैं। लेकिन अब एम्स भोपाल के डॉक्टरों ने एक ऐसी राह दिखाई है, जो इन गंभीर मामलों में भी अंग बचाने की संभावना बढ़ा रही है। 23 ऐसे मरीजों का इलाज माइक्रोसर्जिकल फ्री-फ्लैप रिकंस्ट्रक्शन तकनीक से किया गया। बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग की रिसर्च टीम का इन नई तकनीक पर किया गया अध्ययन अमेरिका की मेडिकल जर्नल एनल्स ऑफ प्लास्टिक सर्जरी में प्रकाशित हुआ है। एम्स के डॉक्टरों के अनुसार ऐसे मामलों में सबसे बड़ी चुनौती होती है कि हाई-वोल्टेज करंट से झुलसे मरीजों में अक्सर मांसपेशियां, नसें और रक्त वाहिकाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। जिससे डॉक्टरों को अंग काटने तक का फैसला लेना पड़ता है। प्रभावित अंग बचाने लगाते हैं शरीर की ही हड्‌डी माइक्रोसर्जिकल फ्री-फ्लैप रिकंस्ट्रक्शन मॉर्डन सूक्ष्म सर्जरी की तकनकी है। इसका इस्तेमाल शरीर के उन हिस्सों को दोबारा बनाने के लिए किया जाता है, जहां गंभीर चोट, जलन या संक्रमण के कारण त्वचा, मांसपेशियां या नसें नष्ट हो गई हों। इसमें मरीज के शरीर के किसी स्वस्थ हिस्से जैसे जांघ, पीठ या पेट से त्वचा, मांसपेशी या हड्डी का एक हिस्सा लिया जाता है। इस हिस्से को फ्री-फ्लैप कहा जाता है, क्योंकि इसे उसकी मूल जगह से पूरी तरह अलग कर दिया जाता है। इसके बाद माइक्रोस्कोप की मदद से बहुत बारीक सर्जिकल उपकरणों से उस फ्लैप की छोटी-छोटी नसों और रक्त वाहिकाओं को घायल अंग की नसों से जोड़ा जाता है। खास बात यह है कि कई बार नसें इंसानी बाल से भी पतली होती हैं और इन्हें जोड़ना सबसे बड़ी चुनौती होती है। यही वजह है कि इसे माइक्रोसर्जिकल तकनीक कहा जाता है। 4 कारण से यह तकनीक है खास समय से ज्यादा अहम घाव की स्थिति शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि अगर सर्जरी को तय समय के बजाय घाव की वास्तविक जैविक स्थिति देखकर किया जाए, तो परिणाम कहीं बेहतर होते हैं। ऊतक कितने जीवित हैं, संक्रमण कितना है और डिब्राइडमेंट कितना सही हुआ है। इन सभी बातों को ध्यान में रखकर सर्जरी करने से जटिलताओं में कमी आती है। इस पद्धति से किए गए इलाज में फ्लैप के सफल रहने की दर 87 प्रतिशत तक दर्ज की गई, जो इस तरह की गंभीर चोटों में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इस महत्वपूर्ण अध्ययन का नेतृत्व डॉ. गौरव चतुर्वेदी ने किया। उनके साथ डॉ. अभिनव सिंह, डॉ. वेद प्रकाश राव चेरुवु और बर्न्स एवं प्लास्टिक सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर डॉ. मनाल मोहम्मद खान भी रिसर्च टीम का हिस्सा रहे। टीम ने इलेक्ट्रिकल बर्न के इलाज में अपनाई जाने वाली पारंपरिक समय-सीमा पर सवाल उठाते हुए मरीज की जैविक स्थिति को प्राथमिकता देने पर जोर दिया। जल्दबाजी बन सकती है नुकसानदेह प्रोफेसर डॉ. मनाल मोहम्मद खान ने कहा कि हाई-वोल्टेज इलेक्ट्रिकल बर्न सबसे जटिल चोटों में गिनी जाती है। इनमें जल्दबाजी में लिया गया सर्जिकल फैसला मरीज के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। यह अध्ययन बताता है कि धैर्य और सही आकलन से न सिर्फ अंग बचाए जा सकते हैं, बल्कि उनकी कार्यक्षमता भी लंबे समय तक कायम रखी जा सकती है। डॉ. खान के अनुसार, माइक्रोसर्जिकल फ्री-फ्लैप तकनीक के जरिए गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त अंगों में नए ऊतकों का निर्माण संभव हो पाया है। इससे मरीज दोबारा चलने-फिरने और सामान्य जीवन जीने की ओर लौट पा रहे हैं। खासतौर पर वे मरीज, जो करंट लगने के बाद आजीवन विकलांगता के डर से जूझ रहे होते हैं, उनके लिए यह तकनीक उम्मीद की किरण बनकर सामने आई है।

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