IIT डायरेक्टर-प्रोफेसर विवाद में SC/ST एक्ट की धाराएं हटाईं:हाईकोर्ट ने की व्याख्या, ‘नीच’ शब्द कहना जातिसूचक गाली नहीं, शेष धाराओं में चलेगा केस

राजस्थान हाईकोर्ट ने आईआईटी जोधपुर के डायरेक्टर और एसोसिएट प्रोफेसर के बीच उपजे विवाद के बाद एक एसोसिएट प्रोफेसर के खिलाफ दर्ज एससी/एसटी एक्ट के तहत आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है। जस्टिस संदीप शाह की एकलपीठ ने डॉ. दीपक अरोड़ा की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि किसी को ‘नीच’ कहना मात्र जाति के आधार पर अपमान नहीं माना जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि प्रोफेसर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धाराओं के तहत पुलिस जांच जारी रहेगी। घटनाक्रम: ऑफिस में हुआ था विवाद दरअसल, यह पूरा मामला 2 सितंबर 2025 का है। आईआईटी जोधपुर के कार्यवाहक रजिस्ट्रार अंकुर गुप्ता ने पुलिस थाना करवड़ में एक एफआईआर दर्ज कराई थी। आरोप था कि प्रोफेसर डॉ. दीपक अरोड़ा संस्थान के डायरेक्टर प्रोफेसर अविनाश अग्रवाल के ऑफिस में चर्चा कर रहे थे। इसी दौरान उनके बीच विवाद हो गया और प्रोफेसर अरोड़ा ने डायरेक्टर पर कथित तौर पर हमला कर दिया। एफआईआर के अनुसार, जब वहां मौजूद ऑफिस असिस्टेंट विवेक गौतम और अन्य कर्मचारियों ने हस्तक्षेप किया, तो प्रोफेसर अरोड़ा ने विवेक गौतम के साथ मारपीट की और उनके लिए ‘नीच’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हुए जातिसूचक गालियां दीं। पुलिस ने इस मामले में बीएनएस की धाराओं के साथ-साथ एससी/एसटी एक्ट की धारा के तहत मामला दर्ज किया था। इसे डॉ. अरोड़ा की ओर से हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। पब्लिक व्यू और नीच शब्द पर दलीलें याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि यदि एफआईआर के तथ्यों को सच मान भी लिया जाए, तो भी एससी/एसटी एक्ट का कोई अपराध नहीं बनता है। वकील ने दलील दी कि जिस ऑफिस में घटना हुई, वह ‘पब्लिक व्यू’ की श्रेणी में नहीं आता, जो एससी/एसटी एक्ट की धाराओं के लिए अनिवार्य शर्त है। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि ‘नीच’ शब्द किसी जाति का नाम नहीं है, बल्कि यह किसी के चरित्र को बताने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला सामान्य शब्द है। सरकारी वकील और शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि आईआईटी के डायरेक्टर एक ‘लोक सेवक’ हैं और आरोपी प्रोफेसर ने जानबूझकर जाति के आधार पर अपमानित करने के उद्देश्य से इन शब्दों का प्रयोग किया। उन्होंने दलील दी कि वहां अन्य कर्मचारियों की मौजूदगी इसे ‘पब्लिक व्यू’ के दायरे में लाती है। हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी और व्याख्या कोर्ट ने इस मामले में कानूनी पहलुओं की विस्तार से व्याख्या की: ‘पब्लिक व्यू’ बनाम ‘पब्लिक प्लेस’: कोर्ट ने ‘स्वरण सिंह बनाम राज्य’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत अपमान सार्वजनिक दृष्टि में होना चाहिए। चूंकि यह घटना डायरेक्टर के बंद कमरे (चेंबर) के भीतर हुई थी, जहां जनता की पहुंच नहीं थी, इसलिए इसे ‘पब्लिक व्यू’ नहीं माना जा सकता। ‘नीच’ शब्द की व्याख्या: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘नीच’ शब्द का अर्थ नीच या अधम होता है, जिसका उपयोग किसी के खराब नैतिक चरित्र को दर्शाने के लिए किया जाता है। यह किसी विशेष समुदाय या जाति का नाम नहीं है। कोर्ट ने पूर्व के फैसलों (अचल सिंह बनाम राजस्थान राज्य) का हवाला देते हुए कहा कि ‘नीच’ कहना जाति आधारित अपमान की श्रेणी में नहीं आता। लोक सेवक (Public Servant): कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि आईआईटी डायरेक्टर लोक सेवक नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि आईआईटी अधिनियम, 1961 के तहत संस्थान राष्ट्रीय महत्व का है और इसके निदेशक की नियुक्ति केंद्र सरकार की परिषद द्वारा की जाती है, इसलिए वे ‘लोक सेवक’ की श्रेणी में आते हैं। जस्टिस संदीप शाह ने अपने फैसले में याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया। कोर्ट ने एफआईआर नंबर 118/2025 में लगाई गई एससी/एसटी एक्ट की धाराओं को रद्द कर दिया है। हालांकि, प्रोफेसर के खिलाफ बीएनएस की धारा, लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए चोट पहुंचाना इत्यादि पर पुलिस अपनी जांच जारी रखेगी। कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि वे बिना किसी पूर्वाग्रह के इस मामले की स्वतंत्र जांच करें।

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