भोपाल के रवींद्र भवन में चल रहे अखिल भारतीय रूपक महोत्सव के दूसरे दिन बुधवार को तीन प्रभावशाली नाटकों की प्रस्तुति हुई। जिसमें साहित्य, संस्कृति और समाज के विविध पहलुओं को सजीव रूप में दर्शाया गया। आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी की नाटिका ‘यूथिका’ , प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा रचित हास्य व्यंग्य ‘मशकधानी’ और आचार्य वसंत कुमार भट्ट का नाटक ‘धर्मचक्र प्रवर्तनम’ की प्रस्तुति ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरी। दूसरे दिन की मुख्य प्रस्तुतियां इस दिन की शुरुआत केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय वेदव्यास परिसर बलाहार, हिमाचल प्रदेश द्वारा आचार्य रेवा प्रसाद द्विवेदी की नाटिका ‘यूथिका’ की प्रस्तुति से हुई। यह नाटिका मानवीय संवेदनाओं और समाज के महत्वपूर्ण रिश्तों को गहराई से उजागर करती है, जिसमें लात वंश की यूथिका और मान वंश के हर्ष के बीच प्रेम संबंध स्थापित होते हैं। नाटक के अभिनय ने दर्शकों को इस कथा के भावनात्मक पहलुओं से जोड़ लिया। इसके बाद, प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी द्वारा रचित हास्य व्यंग्य ‘मशकधानी’ का मंचन हुआ, जो मच्छरों के आतंक और उनके द्वारा व्यक्त की गई समस्याओं को व्यंग्यात्मक तरीके से दर्शाता है। यह नाटक दर्शाता है कि किस प्रकार सामान्य जीवन की दिनचर्या में हास्य उत्पन्न होता है। इसके अतिरिक्त, गुजरात विश्वविद्यालय के आचार्य वसंत कुमार भट्ट का नाटक ‘धर्मचक्र प्रवर्तनम’ भी इस दिन की महत्वपूर्ण प्रस्तुति था। कालीकट आदर्श संस्कृत विद्यापीठ, केरल ने इसे प्रस्तुत किया। भगवान इंद्र और शशपण्डित के संवाद पर आधारित इस नाटक ने दर्शाया कि किस प्रकार शशपण्डित इंद्र को प्रसन्न कर बुद्धत्व का वरदान प्राप्त करता है। इसके साथ ही, गुरुवायुर केरल से आए नाट्य दल ने कविवर राधा वल्लभ त्रिपाठी द्वारा रचित ‘सुशीला’ नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें महिलाओं की पीड़ा और शक्ति को दर्शाया गया। सुशीला ने महिलाओं की शक्ति को पहचाना और उसे सशक्त रूप से प्रकट किया। इसी श्रृंखला में भोपाल परिसर ने देवशुनी रूपक प्रस्तुत किया। ऋग्वेद की कथा पर आधारित इस रूपक में दर्शाया कि भ्रष्टाचार व अनैतिकता जगत में व्याप्त होने पर भगवान इंद्र किस प्रकार सृष्टि के पशु पक्षियों की सहायता से सत्य व मूल्य को पुनर्स्थापित करते हैं। शास्त्रों में सदैव ही सृष्टि के समस्त अंगों को महत्व दिया गया है। देवताओं के गोधन को उनके शत्रु पणि चुरा लेते हैं। गायों की खोज में सुपर्ण नामक गरुड़ को भेजा जाता है। भगवान इंद्र सरमा नामक एक श्वान को इस गोधन को ढूंढने का कार्य देते हैं। इस रूपक को लोकगीतों और लोक नाटक की प्रस्तुति के रूप में दर्शाया गया, जो न केवल पारंपरिक शैली को जीवित करता है बल्कि समकालीन संदर्भ में भी उसकी प्रासंगिकता को उजागर करता है। साथ ही, संस्कृत रंगम चेन्नई से आईं नंदनी रमणी ने ‘भगवदज्जूकीयम’ नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें अनासक्त योग और मोक्ष के मार्ग को दर्शाया गया। यह नाटक शिष्य और गुरु के बीच के गहरे संवाद को सजीव रूप से प्रस्तुत करता है, और मानव जीवन के सार को हास्य और अभिनय के माध्यम से सामने लाता है। इस महोत्सव में न केवल नाट्य प्रस्तुतियां थीं, बल्कि प्रत्येक दिन लोक कलाकारों द्वारा निमाड़ी और बुंदेली लोकगीतों की भी प्रस्तुतियां की जा रही हैं, जो समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने का एक अनूठा प्रयास है। 4 दिवसीय इस आयोजन के तीसरे दिन यानि कल कई प्रमुख प्रस्तुतियां आयोजित होंगी। तीसरा दिन-13 फरवरी (गुरूवार)
आश्चर्यकरमेव
विषमपरिणयम्
विकसतु एषा कलिका
वासन्तिकस्वप्नम
शम्बूकाभिषेकम्
भासोहासः
पण चौथा दिन-14 फरवरी(शुक्रवार)
कौण्डिन्यप्रहसनम्
पल्लीकमलम्
ओडिसी नृत्यम्
सम्पूर्तिसत्रम्


