भास्कर न्यूज | महुआडांड़ प्रखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था सरकारी फाइलों और प्रशासनिक सुस्ती के बीच दम तोड़ रही है। लगभग 22 करोड़ रुपए लागत से निर्मित नया अनुमंडलीय अस्पताल भवन पिछले पांच महीनों से बनकर तैयार है, लेकिन विभागीय तालमेल और बजट आवंटन की कमी के कारण इस पर अब भी ताला लटका है। आलम यह है कि अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस यह भवन आज महज एक शो-पीस बनकर रह गया है, जबकि क्षेत्र की करीब एक लाख आबादी आज भी बुनियादी इलाज के लिए जद्दोजहद कर रही है। इस नए अस्पताल को इस उद्देश्य से बनाया गया था कि स्थानीय स्तर पर ही जटिल ऑपरेशन और जांच की जा सके। भवन में अत्याधुनिक ऑपरेशन थिएटर, सुव्यवस्थित ओपीडी कक्ष, मरीजों के लिए लिफ्ट व रैंप, 50 बेड का वार्ड और मेडिकल स्टाफ के लिए आवासीय क्वार्टर तैयार हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि भवन तैयार होने के बाद उन्हें उम्मीद थी कि अब इलाज के लिए बाहर नहीं भागना पड़ेगा, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। महुआडांड़ प्रखंड की लगभग एक लाख आबादी के लिए सीएचसी में केवल एक डॉक्टर व एक डेंटिस्ट तैनात हैं, जबकि यहां 7 चिकित्सकीय पद स्वीकृत हैं। स्थिति और भी चिंताजनक है क्योंकि आज तक एक्स-रे और अल्ट्रासाउंड जैसी बुनियादी जांच सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। गंभीर मरीजों को बाहर रेफर करना पड़ता है, जिससे इलाज में देरी और कई बार जान का जोखिम बढ़ जाता है। जहां 10 स्टाफ नर्सों के पद स्वीकृत हैं, वहां केवल 4 नर्सें कार्यरत हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एक भी फार्मासिस्ट पदस्थापित नहीं है। प्रखंड के 13 स्वास्थ्य उपकेंद्र केवल नर्सों के भरोसे संचालित हो रहे हैं। पोस्टमार्टम हाउस न होने से सड़क दुर्घटना या अन्य मामलों में परिजनों को भारी मानसिक पीड़ा झेलनी पड़ती है। अस्पताल के हैंडओवर न होने का मुख्य कारण भुगतान है। भवन प्रमंडल के जेई ने बताया कि इस्टीमेट के अनुसार भुगतान हो चुका है, लेकिन बाद में बनी आरसीसी बाउंड्री वॉल और पीसीसी कार्य का लगभग 1 करोड़ रुपया बकाया है। इसी राशि के भुगतान न होने के कारण भवन को स्वास्थ्य विभाग को नहीं सौंपा गया है।भवन प्रमंडल के कार्यपालक अभियंता कमलेश कुमार के अनुसार, आगामी मार्च तक आवंटन मंगाकर भुगतान की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी, जिसके बाद ही अस्पताल चालू हो सकेगा। कहां फंसा है पेंच यदि यह अस्पताल चालू होता है, तो मातृ-शिशु मृत्यु दर में कमी आएगी। सड़क दुर्घटना और प्रसव जैसी आपातकालीन स्थितियों में समय पर इलाज मिलने से जान बचाई जा सकेगी। साथ ही, गरीब ग्रामीणों को निजी अस्पतालों की लूट से मुक्ति मिलेगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे।वही इस संबंध मे महुआडांड़ पंचायत के पूर्व मुखिया निर्मल उरांव ने कहा कि सिर्फ 22 करोड़ का भवन खड़ा कर देना ही विकास नहीं है। जब तक डाक्टरो की खाली पदों को भरा नहीं जाता और बंद पड़े तालों को नहीं खोला जाता, तब तक महुआडांड़ की जनता के लिए “बेहतर स्वास्थ्य” महज एक सपना ही रहेगा।


