हिंदू सम्मेलन में 51 जोड़ों ने एक साथ किया यज्ञ:पिलानी महाराणा प्रताप बस्ती में हुआ धार्मिक कार्यक्रम; संतों ने सामाजिक समरसता, राष्ट्र एकता का संदेश दिया

पिलानी के महाराणा प्रताप बस्ती क्षेत्र में सर्व हिंदू समाज के तत्वावधान में विराट हिंदू सम्मेलन आयोजित किया गया। यह सम्मेलन सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र एकता का सशक्त मंच बनकर उभरा। संतों के सान्निध्य, सामूहिक यज्ञ और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने इस आयोजन को ऐतिहासिक स्वरूप प्रदान किया। राजगढ़ रोड रायला मोड़ पर स्थित महाराणा प्रताप बस्ती में हुए इस सम्मेलन में बाबा दशहरा नाथ और महंत मोहनगिरि महाराज मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। समाज के विभिन्न वर्गों की व्यापक सहभागिता ने इस आयोजन को एक विस्तृत सामाजिक स्वरूप दिया।सम्मेलन के मंच पर विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधियों को एक साथ बैठाकर सामाजिक एकता का स्पष्ट संदेश दिया गया। मंचासीन प्रमुख लोगों में बनवारी धत्तरवाल, सुरेंद्र सिंह शेखावत, दुर्गा प्रसाद जागीड़, प्रताप सिंह गोड, फूल सिंह खिचड़, चंद्रभान स्वामी, मातुराम कुमावत, माडुराम सैनी, सीताराम नायक, बजरंग प्रजापति, श्रीकांत गोड, मोती सिंह राठौड़, श्रवण चिराणियां और श्यामलाल वाल्मीकि सहित कई गणमान्य व्यक्ति शामिल थे। कार्यक्रम का संचालन नितिन पाठक ने किया, जबकि मुख्य वक्ता अनिल दाधीच ने महाराणा प्रताप की परंपरा को राष्ट्र और समाज की एकता से जोड़ा। गायत्री शक्तिपीठ पिलानी के निर्देशन में 51 जोड़ों ने सामूहिक यज्ञ में भाग लिया। इस दौरान बालक शुभ गजराज की कविता और टैगोर स्कूल के विद्यार्थियों द्वारा प्रस्तुत गणेश स्तुति व सरस्वती वंदना ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। सम्मेलन में जैविक खेती, गौ सेवा, सामाजिक समरसता, संयुक्त परिवार परंपरा और धर्म जागरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले व्यक्तियों को सम्मानित किया गया। हरचंद सांगवान, सुभाष माजूं, प्रमोद माजूं, सत्यवीर महण, सत्यनारायण सैनी, घिसाराम, सुमेर स्वामी, मनोज जागीड़ और राजेंद्र सैन को मंच से यह सम्मान प्रदान किया गया।राज्य स्तरीय दिशा कमेटी के सदस्य पवन चौधरी ने पंच परिवर्तन—सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, कुटुंब प्रबोधन, नागरिक कर्तव्य और स्वदेशी—के महत्व पर प्रकाश डाला। सम्मेलन में “हिंदू-हिंदू एक समान”, “एक हिंदू-एक पेड़” और “लोकल के लिए वोकल” जैसे उद्घोष गूंजे। कार्यक्रम का समापन “वसुधैव कुटुंबकम्” के भाव के साथ हुआ।

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