जालंधर शहर का नाम भले ही एक दानव के नाम पर पड़ा हो, लेकिन इसका आध्यात्मिक संबंध आदिदेव महादेव से अत्यंत गहरा है। शहर के मध्य स्थित ब्रह्मकुंड मंदिर नजदीक किशनपुरा चौक मात्र एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हजारों वर्षों के उस इतिहास का साक्षी है, जिसका वर्णन शिव पुराण और श्रीमद्भागवत गीता जैसे ग्रंथों में मिलता है। दशहरे-शिवरात्रि पर होता है विशेष आयोजन : सहगल परिवार इस मंदिर की सेवा पीढ़ियों से करता आ रहा है। सुरेश सहगल बताते हैं कि उन्हें वर्ष 2000 में विधिवत सेवा का सौभाग्य मिला। पिछले 18 वर्षों से मंदिर प्रांगण में दशहरा का पर्व भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है। मंदिर के पंडित रमन जोशी के अनुसार, इस स्थान का इतिहास सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी से जुड़ा है। मान्यता है कि मंदिर परिसर में स्थित प्राचीन कुंड में ब्रह्मा जी स्वयं स्नान कर भगवान शिव की आराधना किया करते थे, इसी कारण इसका नाम ब्रह्मकुंड पड़ा। इतिहास की परतों को खोलते हुए उन्होंने बताया कि समुद्र से उत्पन्न जलंधर राक्षस को ब्रह्मा जी इसी स्थान पर लेकर आए थे। कथा है कि जब बालक जलंधर ने ब्रह्मा जी की दाढ़ी खींची, तो उनके नेत्रों से अश्रु निकल आए, जिसके बाद उसका नाम जलंधर रखा गया। बाद में जब इस राक्षस का आतंक बढ़ा, तो उसे शांत करने और धरा को मुक्त कराने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शिव) ने इसी स्थान पर आकर विश्राम किया और रणनीति बनाई। अंततः त्रिदेवों ने मिलकर यहीं जलंधर राक्षस का संहार किया। भगवान शिव के स्वरूप को लेकर भक्तों में अटूट आस्था है। जहां एक ओर उनका जटाधारी रूप अत्यंत सौम्य और कल्याणकारी है, वहीं दुष्टों के लिए वह संहारक भी हैं। भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में की गई पूजा कभी निष्फल नहीं जाती। मंदिर में शिव परिवार के साथ-साथ महाकाली, शनिदेव महाराज, भैरों बाबा, हनुमान जी और भगवान बाबोसा की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं।


