बाल न्यायालय का फैसला:नाबालिग को दादी की सुपुर्दगी में देने के आदेश, बहन की अपील खारिज

बाल न्यायालय (जिला एवं सत्र न्यायाधीश) ने एक महत्वपूर्ण आदेश में नाबालिग बालिका को राजकीय बालिका गृह से मुक्त कर उसकी दादी की सुपुर्दगी में देने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि बालिका के 18 वर्ष की आयु पूर्ण होने तक उसका विवाह नहीं कराया जाएगा तथा उसके पालन-पोषण और शिक्षा की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी। मामला पुलिस थाना उच्चैन में दर्ज एफआईआर संख्या 289/2025 से संबंधित है। अपीलांट दादी की ओर से अधिवक्ता उदयवीर सिंह कसाना ने बताया बालिका के माता-पिता के निधन के बाद वह पालनहार योजना के तहत अपनी दादी के साथ रह रही थी। आरोप है कि बड़ी बहन उसे अपने देवर के साथ विवाह कराने के उद्देश्य से ले जाना चाहती थी। इसी संदर्भ में उच्चैन थाने में मामला दर्ज हुआ। पुलिस ने 2 जनवरी 2026 को बालिका को दादी से दस्तयाब कर बाल कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत किया, जहां से उसे राजकीय बालिका गृह भेज दिया गया। बाद में दादी, बड़ी बहन और छोटे बाबा ने सुपुर्दगी के लिए समिति के समक्ष प्रार्थना पत्र दिए, लेकिन समिति ने 21 जनवरी 2026 को तीनों के आवेदन खारिज करते हुए बालिका को बालिका गृह में ही रखने के आदेश दिए। इस आदेश के विरुद्ध दादी और बड़ी बहन ने अलग-अलग अपीलें बाल न्यायालय में दायर कीं। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने बालिका से व्यक्तिगत रूप से संवाद किया। बालिका ने दादी के साथ रहकर आगे पढ़ाई जारी रखने की इच्छा जताई। न्यायालय ने निर्देश दिए कि जिला समाज कल्याण अधिकारी एवं जिला विधिक सेवा प्राधिकरण द्वारा नियुक्त पैरालीगल वॉलंटियर (पीएलवी) बालिका के बालिग होने तक प्रत्येक छह माह में उसकी स्थिति संबंधी रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे। साथ ही अटलबंद थाना प्रभारी को यह सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए कि बालिका के साथ किसी प्रकार का शोषण, बाल विवाह या अन्य अवैध गतिविधि न हो। बड़ी बहन द्वारा दायर अपील को न्यायालय ने खारिज कर दिया। 6 फरवरी 2026 को खुले न्यायालय में सुनाए गए इस आदेश को बाल संरक्षण की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिसमें बालिका की इच्छा और उसके भविष्य को प्राथमिकता दी गई है।

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