भास्कर न्यूज | राजिम कुंभ कल्प मेला में अपेक्षित भीड़ न जुटने और आयोजन स्थल की अव्यवस्था को लेकर आखिरकार प्रशासन हरकत में आया है। नया मेला मैदान राजिम नगर से दूर होने और दर्शकों की संख्या लगातार घटने पर अब भीड़ लाने के लिए दो निशुल्क बसें शुरू की गई हैं। हालांकि रविवार अवकाश के कारण मेले में काफी भीड़ रही। दरअसल, स्थानीय लोगों की उपेक्षा, अव्यवस्था, कमजोर प्रचार और दूरस्थ मेला स्थल के कारण राजिम का मेला मैदान कई दिनों तक सुनसान नजर आता रहा। लोगों ने आवाज उठाई कि न कार्यक्रम ढंग के हैं, न पहुंचने की सुविधा। तब जाकर ये कदम उठाया गया है। इधर पुराने मेला स्थल नदी तट पर भीड़ की कोई कमी नहीं है, लेकिन नया मेला स्थल विशाल है, वहां अब भी भीड़ नहीं दिखती। जबकि मेले का आयोजन भव्य स्तर पर किया जा रहा है। मुख्य मंच भी भव्य ही है। रोज रंगारंग कार्यक्रम हो रहे हैं। बता दें कि मेला स्थल चौबेबांधा की ओर से जाने पर लगभग दो किमी और नवापारा की तरफ से तीन किमी से ज्यादा है। पैदल ही जाना पड़ता है। जिला परिवहन विभाग, गरियाबंद द्वारा शहर से नवीन मेला मैदान राजिम तक दो यात्री बसें निशुल्क चलाई जा रही हैं। एक बस राजिम के बस स्टैंड में खड़ी रहती है और दूसरी मेला मैदान में, ताकि यात्रियों को लाने-ले जाने में देर न हो। करीब ढाई किलोमीटर की दूरी होने के कारण पैदल जाने वालों के लिए यह सुविधा राहत जरूर है, लेकिन लोग साफ कह रहे हैं कि यह फैसला स्वेच्छा से नहीं, दबाव में लिया गया है। बसों में सुरक्षा के लिए पुलिस बल भी तैनात किया गया है और पहचान के लिए सामने बैनर लगाए गए हैं। श्रद्धालुओं का ये भी कहना है कि ये दो बसें कम हैं। क्योंकि एक बार में इनमें केवल 100 यात्री आ जा सकते हैं।
शाम और रात को ज्यादा जरूरत: हालांकि ये बसें दिनभर कई फेरे लगा रही हैं, लेकिन श्रद्धालुओं का कहना है कि असली जरूरत दोपहर बाद से देर रात तक होती है। देर रात लौटने वाले बुजुर्गों और महिलाओं के लिए यही समय सबसे ज्यादा जोखिम भरा होता है। अगर बस सेवा रात में भी नियमित चले, तभी इसे सच्ची जनसुविधा कहा जाएगा वरना यह सिर्फ भीड़ जुटाने की एक कोशिश भर बनकर रह जाएगी। मेला पहुंची रामती बाई, सीता साहू, भूखिया, चांदनी और केसर ने कहा कि हम बस स्टैंड तक तो आ गए थे, लेकिन आगे मेला कैसे जाएंगे, यही चिंता थी। फ्री बस से पहुंचे, पर ये सुविधा पहले दिन से होनी चाहिए थी। रामकुमार, भीष्म, दीपक और राघवेंद्र ने कहा प्रशासन की यह पहल अच्छी है, लेकिन सवाल ये है कि जब मेला खाली पड़ा था तब क्यों नहीं सोचा गया, अब जब आलोचना हुई तो व्यवस्था की जा रही है। जब मेला खाली रहा तो कोई सुनने वाला नहीं था।


