परफॉर्मेंस रैंकिंग रिपोर्ट में खुलासा:भोपाल की बिजली कंपनी सबसे ज्यादा 1769 करोड़ के घाटे में, यह जबलपुर से दोगुना; चोरी रोकने में भी है पीछे

मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी प्रदेश की अन्य दोनों बिजली कंपनियों के मुकाबले बेहद कमजोर साबित हो रही है। बिजली चोरी रोकने और बिलों की वसूली करने में भोपाल की मध्य क्षेत्र बिजली कंपनी प्रदेश में सबसे फिसड्डी है। यह बिजली कंपनी पिछले साल 1769 करोड़ रुपए के घाटे में रही, जो जबलपुर की पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के मुकाबले दोगुने के करीब है। वहीं इंदौर की पश्चिम क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी 121 करोड़ रुपए के फायदे में रही।केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी की गई परफॉर्मेंस रैंकिंग रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। रिपोर्ट में तीनों कंपनियों के पिछले साल के घाटे के आंकड़े और बिल वसूली क्षमता (बिलिंग एफिशिएंसी) भी जारी की गई है। इसके अनुसार मध्य क्षेत्र बिजली कंपनी लगभग 30% बिजली बिलों की वसूली भी नहीं कर पाती। उसकी बिलिंग एफिशिएंसी सिर्फ 73.04% है। कंपनी की यह स्थिति तब है जब केंद्र और राज्य सरकार की अलग-अलग योजनाओं के तहत बिजली चोरी रोकने के लिए अंडरग्राउंड केबल बिछाने, स्मार्ट मीटर लगाने और फीडर सेपरेशन जैसे कई काम किए जा रहे हैं। 2005 में बनी कंपनी, तब से लेकर पिछले वित्त तक 30,900 करोड़ का घाटा 21 साल में 30,900 करोड़ रु. का संचयी घाटा : प्रदेश में बिजली कंपनियों का गठन वर्ष 2005 में हुआ था। मध्य क्षेत्र कंपनी तब से लगातार घाटे में चल रही है। स्थापना से लेकर पिछले वित्त वर्ष तक कंपनी पर 30,900 करोड़ रुपए का संचयी घाटा दर्ज किया गया है।
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार: पूर्व क्षेत्र कंपनी पर 27,992 करोड़ रु. का संचयी घाटा।
पश्चिम क्षेत्र कंपनी पर 12,503 करोड़ रु. का संचयी घाटा।
यानी घाटे के मामले में मध्य क्षेत्र कंपनी सबसे खराब स्थिति में है। मतलब: यदि कंपनी 100 यूनिट बिजली सप्लाई करती है तो मध्य क्षेत्र में सिर्फ 73 यूनिट की ही बिलिंग हो पाती है, शेष बिजली तकनीकी नुकसान या चोरी में चली जाती है। एक्सपर्ट से समझें: चोरी क्यों नहीं रुकती, बिल वसूली कमजोर बिजली मामलों के जानकार एवं रिटायर्ड एडिशनल चीफ इंजीनियर राजेंद्र अग्रवाल बताते हैं—
1. मध्य क्षेत्र में बड़ी संख्या में पुराने तार, जर्जर लाइनें और ओवरलोडेड ट्रांसफॉर्मर हैं। तकनीकी हानि (टेक्निकल लॉस) ज्यादा है, जिससे वास्तविक सप्लाई और बिलिंग में अंतर बढ़ता है।
2. भोपाल, विदिशा, राजगढ़, सीहोर जैसे जिलों में शहरी और ग्रामीण उपभोक्ताओं का मिश्रित लोड है। ग्रामीण इलाकों में मीटरिंग कमजोर और लाइन लॉस ज्यादा रहता है।
3. कई स्थानों पर डायरेक्ट कनेक्शन, कटिया और मीटर बायपास जैसे तरीके हैं। कार्रवाई के दौरान स्थानीय विरोध और राजनीतिक दबाव भी बाधा ।
4. रीडिंग समय पर नहीं होना, औसत बिलिंग, गलत आकलन और विवादित बिल।
5. रिकवरी स्टाफ की कमी, बड़े बकायेदारों पर ढीली कार्रवाई और सरकारी विभागों के बकाया भी घाटा बढ़ाते हैं।
6. जहां स्मार्ट मीटर लगे, वहां वसूली सुधरी है, लेकिन मध्य क्षेत्र में इसका कवरेज अभी सीमित है। समाधान : घाटा कम करने के उपाय 100% स्मार्ट मीटरिंग
हाई लॉस फीडर की विशेष मॉनिटरिंग
प्रीपेड बिलिंग सिस्टम लागू करना
सरकारी विभागों के बकाया की एडजस्टमेंट
एरियल बंच केबल का विस्तार
चोरी प्रभावित क्षेत्रों में विशेष पुलिस-डिस्कॉम अभियान
आम उपभोक्ताओं पर इसका क्या असर
ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक वितरण कंपनियों का घाटा अंततः राज्य सरकार की सब्सिडी और आम उपभोक्ताओं के टैरिफ पर दबाव बनाता है। यदि मध्य क्षेत्र की स्थिति नहीं सुधरी तो भविष्य में बिजली दरों में वृद्धि की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *