सुखाड़िया यूनिवर्सिटी में 300 परिवारों की रोजी-रोटी पर संकट:25 साल सेवा देने वाले 300 कर्मचारियों को बाहर करने की तैयारी, अब ठेके पर रखे जाएंगे कर्मचारी

उदयपुर के मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (सुविवि) में एक बार फिर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। करीब 300 एसएफएबी कर्मचारियों की नौकरी पर तलवार लटक रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाने का मन बना लिया है। खास बात यह है कि प्रशासन अब इन भर्तियों को एक निजी ठेका कंपनी को सौंपने की तैयारी में है। इसके लिए बकायदा मैनपावर सेवाओं के लिए एक समिति का गठन भी कर दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि जिस ठेका प्रथा का विश्वविद्यालय प्रशासन पहले खुद विरोध कर चुका है, अब उसी को अपनाने के लिए जोर-शोर से टेंडर प्रक्रिया शुरू की जा रही है। माना जा रहा है कि ऊपरी दबाव के चलते प्रशासन ने पुराने अनुभवी कर्मचारियों के बजाय एजेंसी के माध्यम से मैनपावर जुटाने का फैसला लिया है। कर्मचारियों और संगठनों का आरोप है कि ठेका प्रणाली आने से उनका शोषण बढ़ेगा। इसमें पारदर्शिता खत्म हो जाएगी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। उनका कहना है कि अगर प्रशासन वाकई कर्मचारियों के भविष्य को लेकर फिक्रमंद होता, तो वह बीच का रास्ता निकालता, न कि उन्हें बाहर करने का रास्ता खोजता। ​इस पूरे मामले को सुलझाने के लिए कुलपति की सहमति से एक कमेटी बनाई गई है। इसमें प्रो. सी.पी. जैन, प्रो. हनुमान प्रसाद और डॉ. अविनाश पंवार सहित कई वरिष्ठ सदस्य शामिल हैं। श्री दीपक वर्मा को इसका कन्वीनर बनाया गया है। यह कमेटी अपनी सिफारिशें देगी। ​ सालों की मेहनत पर पानी फेरने की तैयारी
विश्वविद्यालय में पिछले 25 सालों से अपनी सेवाएं दे रहे एसएफएबी कर्मचारी इस फैसले से गहरे सदमे में हैं। इन कर्मचारियों का कहना है कि वे सालों से सुविवि को सींच रहे हैं, लेकिन अब उन्हें दूध में से मक्खी की तरह निकालने की कोशिश हो रही है। कर्मचारियों का आरोप है कि नई एजेंसी को लाकर प्रशासन केवल पुराने और अनुभवी लोगों को हटाना चाहता है। सरकार के आदेश को किया दरकिनार
एक साल पहले राज्य सरकार ने जनवरी 2025 से दिसंबर 2025 तक इन कर्मचारियों की सेवा जारी रखने का आदेश दिया था। नियम के मुताबिक प्रशासन को आगे की अवधि के लिए सरकार से फिर अनुरोध करना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसके बजाय कर्मचारियों को केवल दो महीने का सेवा विस्तार देकर उनकी भर्ती परीक्षा आयोजित करवाई गई। कर्मचारी इस परीक्षा के बाद स्थाई नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन उन्हें इनाम में ठेका प्रणाली का तोहफा मिल गया। समिति के गठन से बढ़ा गुस्सा
कुलपति की मंजूरी के बाद मैनपावर सेवाओं के लिए जो समिति बनी है, उसे लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि इस समिति में वही लोग शामिल हैं जो पहले उनके समर्थन में खड़े थे, लेकिन आज उनके विरोध में नजर आ रहे हैं। कर्मचारियों को डर है कि ठेका प्रथा लागू होने से उनका शोषण बढ़ेगा, काम में पारदर्शिता खत्म होगी और भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। आंदोलन की सुगबुगाहट
कर्मचारियों ने साफ कर दिया है कि वे इस फैसले को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे। कैंपस में एक बार फिर बड़े आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। कर्मचारियों का तर्क है कि जब सरकारी आदेश पहले से ही कर्मचारियों के पक्ष में हैं, तो प्रशासन जबरन नया ठेका मॉडल क्यों थोपना चाहता है? फिलहाल, 300 परिवारों की रोजी-रोटी का सवाल अब विश्वविद्यालय की राजनीति और प्रशासनिक फाइलों के बीच उलझकर रह गया है। अब कैंपस में यह सवाल उठ रहा है कि जब सरकार का आदेश पहले से है, तो प्रशासन संविदा मॉडल क्यों थोपना चाहता है? कर्मचारियों का मानना है कि यह उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ है। माहौल को देखते हुए चर्चा है कि क्या यूनिवर्सिटी में एक बार फिर आंदोलन होगा।

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