मासूमों को कैसे बनाया जाता था नक्सली…:नाटकों से प्रशासन के खिलाफ भरते थे जहर, युवाओं को बंदूक देकर कहते थे- तुम योद्धा हो

नारायणपुर जिले का लाइवलीहुड कॉलेज आज सामान्य शैक्षणिक संस्थान नहीं रह गया है। चारों ओर सुरक्षाबलों का घेरा, बिना अनुमति प्रवेश वर्जित, क्योंकि यही कॉलेज अब नक्सलियों का पुनर्वास केंद्र है। कभी इसी इमारत पर हमला करने वाले 110 आत्मसमर्पित नक्सली आज यहीं सिलाई, ड्राइविंग, नल-सोलर मिस्त्री जैसे हुनर सीख रहे हैं। इनके हाथों में अब बंदूक नहीं, बल्कि औजार और किताबें हैं। लेकिन इनके भीतर का अतीत आज भी डराता है। कई नक्सलियों पर तो 8 लाख तक का इनाम घोषित था। पहली बार कोई अखबार इस पुनर्वास केंद्र तक पहुंचा। यहां दैनिक भास्कर ने नक्सलियों से बातचीत कर समझने की कोशिश की कि आखिर गांवों के मासूम आदिवासी दुर्दांत नक्सली कैसे बन गए। इस सवाल का जवाब मिला नाटक, नक्सल साहित्य देकर प्रशासन के खिलाफ उन्हें बरगलाया गया। हथियार देकर कहा गया कि लड़ो… तुम योद्धा हो। कॉलेज के प्राचार्य मानकलाल अहिरवार बताते हैं कि ये लोग आज भी अतीत और भविष्य की बात सोचकर बेचैन हो जाते हैं। कुछ नाखूनों से दीवारें खुरचते हैं, कुछ को हंसते देखा ही नहीं गया। कई गांव लौटना नहीं चाहते। हालांकि, एक बात साफ है- ये बेहद अनुशासित हैं और सीखने की तीव्र ललक रखते हैं। घरवालों ने रोका था, पर मेरा मन बदल चुका था: रमली
मैं नारायणपुर के परथापुर गांव की रहने वाली हूं। 2008 में संगठन के नाच-गाने से प्रभावित होकर उनसे जुड़ी। 6 भाई- बहनों में दूसरे नंबर की हूं। जब मैं नक्सली बनी तो घरवालों ने रोका। लेकिन गरीबों से अन्याय के खिलाफ मुझे लड़ना था। इसलिए नहीं लौटी। वहां अजय दा ने बंदूक चलाना सिखाया। हमें सिखाया गया कि पुलिस हमारी दुश्मन है। पहले एरिया कमेटी में जोड़ा गया। तब 15 से 30 हजार रुपए आते थे। इसी से खर्च चलाना होता था। जंगल में चलते ही रहते थे। बीमार होते समय डिवीजन कमेटी वाले इलाज करवाते थे। 2024 में पिता चल बसे। उधर, पुलिस का दबाव बढ़ रहा था। तब मैंने हमारे नेता भास्कर और रूपेश दादा से विचार करके सरेंडर कर दिया। बंदूक साफ करते-करते चलाना सीखा: पंडीराम ध्रुव
कटुलनार निवासी पंडीराम ध्रुव बताते हैं कि 21 साल की उम्र में 2010 में नक्सली बने। गांव में आने वाले नाटक, पर्चे और जल-जंगल-जमीन की बातें उनके मन में घर कर गईं। पहले बंदूक साफ करने का काम मिला, फिर चलाना सिखाया गया। 4 मुठभेड़ों में पुलिस से आमना-सामना हुआ, लेकिन वे कभी पकड़े नहीं गए। जब मैं संगठन में आया तो मेरी शादी हो चुकी थी। पार्टी का नियम है कि अनुम​ति लेकर पत्नी से मिलने जा सकते हैं। दो-चार साथी लेकर मैं परिवार से मिलने जाता था। हमें कोई वेतन नहीं मिलता था, बस जंगल को बचाना है यही हमारा उद्देश्य था। रूपेश दा के साथ 210 लोगों ने सरेंडर किया, हम भी साथ आने वाले थे। लेकिन तब नहीं आ पाए। बाद में सलाह लेकर मुख्य धारा में जुड़े हैं। अब समझ आ रहा कि जंगल की जिंदगी से यह अच्छी है। डॉक्टर की तरह ट्रेनिंग, टांके लगाना, नसबंदी सीखी: सुखलाल
ऐनमेटा गांव के सुखलाल 14 साल की उम्र में संगठन से जुड़ गए। वे बताते हैं, 2006 में आकाबेड़ा में पढ़ता था, जहां नक्सली मेजर दिलीप आते थे। वे कहानी सुनाते। उससे हथियार उठाने की सोची। मेरा सपना था डॉक्टर बनूं। मेरे लीडर को जब पता चला तो उन्होंने बंगाल से आए डॉक्टर शंकर से मेरी ट्रेनिंग करवाई। 3 महीने में ही मैं कमर दर्द, उल्टी, दस्त, छोटी सर्जरी करना सिखाया गया। जैसे बुलेट निकालकर टांका लगाना, नसबंदी करना सीखा। 2022 के बाद फोर्स का मूमेंट बढ़ा। 23 मई 2024 को रुकवाया में घिर गए। तब मैं रेला दीदी का इलाज कर रहा था, जो आंध्र की थीं। मुठभेड़ में 8 लोग मारे गए। 20 अगस्त 2025 को मैंने सरेंडर कर दिया। मैं बीजीएल और 12 बोर की बंदूक बनाता था: दिवाकर
कांकेर जिले के दिवाकर गावड़े बताते हैं कि सलवा जुड़ूम के दौर में फोर्स की कार्रवाई और नक्सलियों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उन्हें संगठन की ओर मोड़ा। 2004 में वे नक्सलियों के साथ चले गए। बाद में अबूझमाड़ में उन्हें देसी हथियार बनाना सिखाया गया। जनरेटर से वेल्डिंग कर पाइप बनते, ट्रकों की पट्टी से बैरल तैयार होते। उनके बनाए हथियार कई मुठभेड़ों में इस्तेमाल हुए। ब्रेनवॉश कर मन बदला, पति की कर दी गई नसबंदी: कमला जूरी
मैं ऐनमेटा गांव की हूं। 2006 में गांव में ​नक्सली आते थे। वह नाटक से बताता कि हमारा शोषण हो रहा है। यह सुन मन बदल गया। मैं उनके साथ चली गई। मुझे अबूझमाड़ में डिप्टी कमांडर बनाया गया। एक साथी के साथ शादी हो गई। बाद में पति की नसबंदी कर दी गई। लीडर्स से बात करके मैंने 20 जुलाई 2025 को सरेंडर कर दिया। जंगल में 19 साल बिताने के बाद अब यहां थोड़ा मुश्किल है। ब्रेनवॉश करते थे नक्सली आत्मसमर्पित 20 नक्सलियों से बात करने के बाद सामने आया कि मासूम आदिवासियों का ब्रेनवॉश ऐसे होता था… नक्सली संगठन नाट्य मंडली से गांव-गांव नाटक और गीतों से प्रचार करता था। लोगों को इकट्ठा कर जल-जंगल-जमीन, खनन और शोषण की कहानियां सुनाता था। 10 से 20 साल के युवा खास निशाने पर रहते। छत्तीसगढ़ी समेत दूसरी भाषा में नाटक किए जाते थे। सरेंडर नक्सली कॉलेज में हुनर सीख रहे हैं। लेकिन जंगल की यादें, खोए हुए साल और भीतर का डर आसानी से पीछा नहीं छोड़ता। फिर भी, मुख्यधारा में लौटने की ये कोशिश शायद उनके जीवन की सबसे बड़ी लड़ाई है- जिसमें जीत का मतलब है, शांत जीवन।

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