झारखंड में शहर की सरकार से विधानसभा चुनाव का नया रास्ता निकलेगा। इस चुनाव में जीत-हार के आधार पर ही वर्ष 2029 के विधानसभा चुनाव का संक्षिप्त आकलन हो सकेगा, क्योंकि राज्य के विधानसभा की करीब 35% सीटें शहरी क्षेत्र में है। इसलिए इस चुनाव को विधानसभा चुनाव का रिहर्सल माना जा रहा है। यही कारण है कि गैरदलीय चुनाव होने के बावजूद सारी पार्टियों ने इसमें पूरी ताकत झोंक दी है। यह चुनाव पार्टियों की अग्नि परीक्षा भी होगी। कागजों पर देखें तो शहरी क्षेत्र में भाजपा मजबूत है। पर जमीन पर देखें तो कहानी उतनी आसान नही दिखती। पार्टियों की सक्रियता: बूथ, वार्ड, मोहल्ला, किस स्तर पर क्या है समर्थित उम्मीदवारों को जिताने के लिए पार्टियों की सक्रियता चरम पर है। राष्ट्रीय नेताओं से लेकर बूथ कमेटी के नेताओं के बीच लगातार संवाद हो रहा है। पूर्व से बनी बूथ कमेटियों के अलावा वार्ड और मोहल्ला कमेटियां भी बनाई गई हैं। कार्यकर्ताओं को 10-10 घरों का दायित्व दिया जा रहा है। इनका काम इन 10 घरों तक ही सीमित होगा। इन 10 घरों के लोगों से वे पूरी चुनाव अवधि तक लगातार संपर्क करेंगे। बड़े नेताओं से मुलाकात कराएंगे। चुनाव के दिन उन्हें बूथों पर ले जाएंगे। इस चुनाव के नतीजे से 5 बड़े राजनीतिक संकेत क्या मिलेंगे क्या निकाय चुनाव में यूजीसी रेगुलेशन का भी कोई असर रहा। भाजपा, झामुमो व कांग्रेस की चुनौतियां और अवसर झामुमो… ग्रामीण वोटरों पर मजबूत पकड़ रखनेवाले झामुमो को शहरी क्षेत्र में खुद को साबित करना होगा कि यहां भी अपने गठबंधन के साथी कांग्रेस से बेहतर है। ऐसे में झामुमो ने अपने कोर वोटर मांझी, महतो और मुसलमान को अपने पक्ष में एक बार फिर संगठित करना होगा। इन वोटरों को विश्वास दिलाना होगा कि वह कांग्रेस से कैसे बेहतर है। तीनों दलों के पास अपना जनाधार बढ़ाने का अवसर है। पर, भाजपा के पास चुनौती बड़ी है कि वह अपने शहरी वोट बैंक को बरकरार रखे। झामुमो के पास मौका है कि वह शहरी वोटरों में अपना विश्वास जमा सके। अगर झामुमो और कांग्रेस की एक साथ बात की जाए, तो इसके पास सबसे बड़ी चुनौती यह है कि कौन पार्टी अल्पसंख्यक वोटरों को अपने पाले में रोके रखती है। कांग्रेस… झारखंड में कांग्रेस के अलग-अलग पॉकेट वोट हैं। अपने मजबूत नेताओं की छवि के कारण यह पार्टी बेहतर प्रदर्शन करती रही है। पर, यह प्रदर्शन झामुमो के साथ गठबंधन होने पर निखरता है। इस बार बिना गठबंधन के कांग्रेस चुनाव मैदान में है। ऐसे में उसे जहां भाजपा से संघर्ष करना है, वहीं झामुमो से भी दो-दो हाथ करने हैं। भाजपा… शहरी वोटर भाजपा पर स्वाभाविक रूप से विश्वास करते हैं। पार्टी प्रत्याशी से परिचय हो या न हो, ये भाजपा को ही वोट देते हैं। भाजपा के पास इन वोटरों का यह विश्वास बचाए रखना चुनौती है। पार्टी का शीर्ष और प्रदेश नेतृत्व ओबीसी समाज से आता है, ऐसे में इसके लिए ओबीसी वोटरों का एकमुश्त समर्थन पाना सबसे बड़ा अवसर है।


