कर्मयोगी बनें और अपने दायित्व को निभाते हुए भक्ति करें: रुचिता तिवारी

भास्कर न्यूज | पलारी नगर में चल रहे श्रीमद् भागवत ज्ञान यज्ञ में चौथे​ दिन कथावाचिका रुचिता तिवारी ने गजेंद्र मोक्ष, समुद्र मंथन की कथा सुनाई। उन्होंने कहा कि कर्मयोगी बनें और अपना दायित्व निभाते हुए प्रभु की भक्ति करें। सात्विकता का भाव मन में रखें व इसका आचरण करें। धर्म की राह पर कितनी भी विपत्ति आए आप अडिग रहें। प्रभु आपका कल्याण जरूर करेंगे। उन्होंने गजेंद्र मोक्ष की प्रसंग की व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान को प्राप्त करने के लिए जीव की योनि का कोई महत्व नहीं होता। उच्च से लेकर निम्न योनि तक का कोई भी जीव सच्ची भक्ति से भगवान को प्राप्त कर सकता है। उन्होंने बताया कि गजेंद्र नामक हाथी जब तालाब में स्नान कर रहा था, तभी ग्राह ने उसका पैर पकड़ लिया। अनेक प्रयासों के बावजूद जब कोई सहायता नहीं मिली, तब गजेंद्र ने स्वयं को भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया। उसकी सच्ची भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान ने उसकी रक्षा की। समुद्र मंथन की कथा सुनाते हुए कहा कि मंथन में एक ओर देवता और दूसरी ओर राक्षस थे। उन्होंने बताया कि देवताओं और दानवों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए संघर्ष हुआ। इस देवासुर संग्राम में देवताओं की विजय हुई। समुद्र मंथन से निकले विष को पीकर भगवान शिव नीलकंठ बने। अमृत पान से देवता अमर हो गए। मानव शरीर सत्कर्म और आराधना के लिए मिला है रुचिता तिवारी ने भगवान विष्णु के पांचवें अवतार वामन भगवान की कथा भी सुनाई। उन्होंने श्रीमद् भागवत कथा श्रवण मात्र से मनुष्य दुखों से मुक्त हो जाता है। भगवान वामन ने राजा बलि से तीन पग भूमि का दान मांगा और तीन पग में पृथ्वी, आकाश तथा स्वयं राजा बलि को नाप लिया। इसके बाद बलि को सुतल लोक का राजा बनाकर भगवान स्वयं उनके द्वारपाल बने।

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