‘अब्बा 8 मुहर्रम को दालमंडी के चौक थाने की तरफ शम्सी भाई के मकान के पास से शहनाई बजाते हुए चहमामा कुएं तक जाते थे। इस दौरान वो इमाम हुसैन के 6 महीने के बच्चे अली असगर की याद में शहनाई पर मातमी धुन; ‘मारा गया है तीर से बच्चा रबाब का’ बजाया करते थे। आज अब्बा नहीं हैं और अब वही दालमंडी तोड़ी जा रही है। अब्बा होते तो दालमंडी नहीं टूटती।’ ये कहना है भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की बड़ी बेटी जरीना बेगम का। जरीना अभी भी उस्ताद के पुश्तैनी मकान में ही रहती हैं। जहां उनके अब्बा ने उन्हें एक कमरा दे रखा था। उस्ताद बिस्मिल्लाह खां और दालमंडी का क्या रिश्ता था। दालमंडी में किस तरह वो मोहर्रम में शहनाई बजाते थे। इन सब पर दैनिक भास्कर ने उस्ताद के परिजनों और दालमंडी के लोगों से बात की और जाना की मोहर्रम को वो खास चांदी की शहनाई पर दो घंटे पैदल चलकर दालमंडी में मातमी धुन बजाते थे तो क्या माहौल होता था और इस दालमंडी से उनकी क्या यादें जुड़ी हैं। पढ़िए रिपोर्ट… उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की देखिए यादगार तस्वीरें… घर वालों ने बिस्मिल्लाह खां और दालमंडी के रिश्ते के बारे में क्या बताया…
भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के सराय हड़हा स्थित मकान संख्या सीके 46/62 पर दैनिक भास्कर की टीम पहुंची। वहां देखा उस्ताद के समय का लेटर बॉक्स आज भी उनकी बैठक के बाहर दीवार पर लगा मिला। अंदर पहुंचे तो उस्ताद के कई नाती-पोते और बहुएं मिली। हमने उनकी बड़ी बेटी जरीना बेगम के बारे में पूछा तो पता चला वो अब्बा हुजूर के कमरे में हैं। हम तीसरे तल पर स्थित उस्ताद के कमरे में पहुंचे। यहां बाहर चारपाई पर बैठी उनकी बेटी जरीना बेगम मिलीं। उस्ताद के घर वालों ने उस्ताद का कमरा उनकी चीजों से सजा रखा है। रोते हुए नंगे पैर दालमंडी में शहनाई बजाते थे बिस्मिल्लाह खां
जरीना बेगम से जब उस्ताद और दालमंडी का जिक्र किया तो उनकी आंखे नम हो गई। जरीना ने बताया – अब्बा 8 और पांच मोहर्रम को जुलूस में शहनाई पर मातामि धुन पेश करते थे। 8 मोहर्रम को जब जुलूस फातमान से लौटकर वापस चौक पर पहुंचता था तो शम्सी भाई के मकान से रोते हुए नंगे पैर मातामी धुन बजाते हुए चहमाम की तरफ इसी दालमंडी में बढ़ते थे। जहां आज तोड़-फोड़ की जा रही है। दो घंटे देखने के लिए उमड़ती थी भीड़
जरीना बेगम ने बताया- अब्बा को सुनने के लिए और देखने के लिए लोगों का हुजूम पहुंचता था। वो जब शहनाई पर नम आंखों से मारा गया है तीर से बच्चा रबाब का पढ़ते थे तो हर किसी की आंखे नाम हो जाती थी। जरीना ने बताया- अब्बा दो घंटे दालमंडी में जगह-जगह रुक कर मातमी धुन अपनी चांदी की शहनाई पर बजाते थे और धीरे-धीरे चहमामा कुएं पहुंचते थे। जहां वो बैठकर शहनाई बजाते थे और जुलूस पहुंचने पर तुर्बत (ताबूत) की जियारत करके ही घर पर लौटते थे। अब्बा होते तो दालमंडी नहीं टूटती
जरीना से जब दालमंडी और उस्ताद के रिश्ते के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा – अब्बा होते तो दालमंडी कभी नहीं टूटती। उनको दालमंडी से लगाव था और दालमंडी को उनसे। कई सारी जगह ऐसी थी जहां अब्बा जाकर बैठकी करते थे। लेकिन अफसोस अब वो जगह नहीं रह जाएंगी। दालमंडी से अटूट रिश्ता था दादा का
उस्ताद के पोते नासिर अब्बास ने बीमार होने के बावजूद हमसे बात की; उन्होंने कहा – दादा का उसूल था कि वो हर साल 8 मुहर्रम को जब जुलूस लौटता था तो शम्सी भाई के मकान के पास से शहनाई बजाते थे। चांदी की शहनाई पर वो नंगे पैर होते हुए चहमामा तक पहुंचते थे। उनकी यादें आज भी हमारे जेहन में है। हम लोग भी जब छोटे थे और होश संभाला तो दादा हुजूर को बजाते देखा। दालमंडी टूटने से दादा जी की यादें भी खत्म हो जाएंगी
नासिर अब्बास ने कहा – दालमंडी टूट रही है। इससे बेशक दादाजी की भी यादें जुड़ी हुई हैं। दादा जी यहां शहनाई बजाते थे और लोगों की आंखे नम हो जाती थी। आज सरकार दालमंडी को तोड़ रही है। दालमंडी के टूटने से दादाजी की यादें भी खत्म हो जाएंगी। अब पढ़िए स्थानीय लोगों की बातचीत रात 2 बजे उमड़ती थी भीड़
दालमंडी के रहने वाले शकील अहमद ने बताया – उस्ताद बिस्मिल्लाह खां भले ही भारत रत्न थे, लेकिन कहीं से भी प्रोग्राम करके आते थे तो घर से सीधे दालमंडी अपने दोस्तों से मिलने आते थे। यहां बैठकी करते थे और विदेश टूर की बातें साझा करते थे। मोहर्रम में वो 8 तारीख को शहनाई पर मातमी धुन बजाते थे। इसे सुनने के लिए रात 2 बजे चौक थाने के पास हजारों लोगों का मजमा उमड़ता था। चहमामा तक पैदल नंगे पैर बजाते थे शहनाई
शकील अहमद ने कहा – 12 महीनों में मोहर्रम के महीने में वो नंगे पैर रहते थे। 8 मोहर्रम को भी नंगे पैर वो शहनाई पर मातमी धुन बजाते थे। और नंगे पैर चलते हुए इसी दालमंडी जहां आज मलबा दिखाई दे रहा है। वहां से गुजरते हुए चहमाम कुएं तक जाते थे। इस दौरान सैकड़ों की संख्या में हिंदू-मुसलमान और संगीत प्रेमी उन्हें सुनने के लिए मौजूद रहते थे और मीडिया उन्हें कवर करने के लिए आती थी। दालमंडी खत्म मतलब धरोहर खत्म
शकील ने कहा – अब दालमंडी टूट रही है। यह सिर्फ इतिहास नहीं धरोहर भी है। अब क्या ही बचा है यहां; दालमंडी अब अंतिम सांस ले रही है और सिसक रही है। अब इसमें हम आप कुछ नहीं कर सकते हैं। सरकार अपना प्रोजेक्ट पूरा करा रही है। अमे क्या हाल है; कहकर लेते थे हाल-चाल
दालमंडी में दुकान चलाने वाले वसीम खां की उम्र 60 साल है। वसीम ने बताया – उस्ताद और दालमंडी का गहरा नाता था। जब तक उनके जिसमें में ताकत रही वो शाम में एक बार जरूर दालमंडी आते और मुस्कुराते हुए हर छोटे बड़े से बस एक ही बात कहते ‘अमे क्या हाल है।’ मुस्कुराते और आगे बढ़ जाते। 17 साल की उम्र से देखा शहनाई बजाते
वसीम खान ने बताया – हम जब 17 या 18 साल के थे। उस वक़्त पहली बार रात के दो बजे भागकर घर से आये थे खां साहब को सुनने के लिए; उन्होंने शहनाई पर दो घंटे तक आंसुओं का नजराना पेश किया था। आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उसके बाद मैंने कई बार उन्हें सुना। दालमंडी के लोगों से बहुत मोहब्बत थी उन्हें
वसीम खान ने बताया – बिस्मिल्लाह खां देश के लिए भारत रत्न थे पर दालमंडी के लिए वो उस्ताद, चचा, दादा और भाई थे। वो हमेशा यहां आये। काफी नेक आदमी थे। दालमंडी का ध्वस्तीकरण देखकर कब्र में उनकी रूह तड़प उठी होगी। दालमंडी के लोगों से वो बहुत मोहब्बत करते थे दालमंडी के बारे में ये भी पढ़िए… अब जानिए क्या है दालमंडी प्रोजेक्ट वाराणसी की दालमंडी गली को मॉडल सड़क के रूप में विकसित किया जाना है। प्रधानमंत्री ने अपने 51वें काशी के दौरे पर इस कार्य का शिलान्यास किया था। इसके लिए राज्य सरकार की तरफ से 215.88 करोड़ रुपए जारी किए गए हैं। 186 भवन, दुकान स्वामियों को 191 करोड़ रुपए मुआवजा के रूप में दिए जाएंगे। 60 फुट चौड़ी होगी सड़क पीडब्ल्यूडी के अधिकारियों के अनुसार नई सड़क से लेकर चौक थाने तक 650 मीटर की दाल मंडी गली को 60 फुट चौड़ा किया जाना है। इसमें 30 फुट की सड़क और दोनों तरफ 15-15 फुट की पटरी होगी। इसके अंदर बिजली, सीवर और पानी की व्यवस्था अंडरग्राउंड की जाएगी। यहां तारों का जंजाल साफ किया जाएगा। 220 करोड़ से बनेगी 650 मीटर लंबी सड़क ——————————–
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