कोबरा काट ले तो इंसान के बचने की उम्मीद फिर भी रहती है, लेकिन अगर कुत्ते के काटने से किसी को रेबीज हो गया, तो उसकी मौत सौ फीसदी तय है। ये कहना है जाने माने बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. उमेश पंडवार का। दरअसल, ये एक कड़वी सच्चाई है जिसे अक्सर लोग नजरअंदाज कर देते हैं। कुत्ते के काटने पर लगने वाला एंटी-रेबीज इंजेक्शन (ARV) हमें एक सुरक्षा का एहसास तो देता है, लेकिन यह एहसास कई बार झूठा साबित होता है। जरा सी लापरवाही, जानकारी का अभाव या इलाज में हुई एक छोटी सी चूक किसी की भी जान ले सकती है। हाल ही में मध्य प्रदेश के दतिया, ग्वालियर और रीवा से आईं खबरों ने इस खतरे को और भी स्पष्ट कर दिया है। इन मामलों में पीड़ितों को न केवल एंटी-रेबीज वैक्सीन लगाई गई, बल्कि कुछ मामलों में इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) भी दिया गया, फिर भी वे जिंदगी की जंग हार गए। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों जीवनरक्षक मानी जाने वाली वैक्सीन बेअसर साबित हो रही है? भास्कर ने इन्हीं सवालों के जवाब जानने के लिए एक्सपर्ट्स से बात की और उन मामलों की पड़ताल की, जहां इलाज के बाद भी मौत ने दस्तक दी। पढ़िए रिपोर्ट घटना: 13 जनवरी को दतिया के सपा पहाड़ इलाके में 6 साल का मासूम हंस प्रजापति अपने घर के बाहर खेल रहा था। तभी एक आवारा कुत्ते ने उस पर जानलेवा हमला कर दिया। कुत्ते ने बच्चे के सिर, हाथ और गर्दन को बुरी तरह नोच डाला। चारों तरफ खून ही खून था। पड़ोसी महिला ने दौड़कर बच्चे को बचाया। परिजन उसे तुरंत जिला अस्पताल ले गए। इलाज: डॉक्टरों ने मामले की गंभीरता को समझते हुए तुरंत इलाज शुरू किया। हंस को एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV), टिटनेस का इंजेक्शन और सबसे महत्वपूर्ण, रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) भी लगाया गया। तय शेड्यूल के अनुसार 16 और 20 जनवरी को वैक्सीन की दूसरी और तीसरी डोज भी दी गई। आखिरी डोज 10 फरवरी को लगनी थी। परिवार को लगा कि अब खतरा टल गया है। मौत: 6 फरवरी की शाम, कुत्ते के काटने के 24 दिन बाद, हंस में रेबीज के लक्षण दिखने लगे। उसे तेज सिरदर्द होने लगा, मुंह से लगातार लार गिरने लगी और उसकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। घबराए परिजन उसे फिर जिला अस्पताल ले गए, जहां से उसे ग्वालियर और फिर झांसी रेफर कर दिया गया। तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वायरस उसके दिमाग तक पहुंच चुका था। रविवार 8 फरवरी की रात इलाज के दौरान हंस ने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों के अनुसार, सिर और गर्दन पर गहरे घाव होने के कारण वायरस बेहद तेजी से दिमाग तक पहुंच गया और RIG भी उसे रोकने में नाकाम रहा। घटना: 16 जून को रीवा के नरेंद्र नगर में 14 वर्षीय राजेश नट अपनी मौसी के घर आया हुआ था। घर के बाहर खेलते समय एक आवारा कुत्ते ने उसकी गर्दन पर हमला कर दिया। परिजन उसे तुरंत जिला अस्पताल ले गए। इलाज: डॉक्टरों ने उसे एंटी-रेबीज के इंजेक्शन लगाए। परिवार ने सोचा कि अब बच्चा सुरक्षित है। मौत: कुछ ही दिनों में राजेश के व्यवहार में अजीब बदलाव आने लगे। वह चिड़चिड़ा हो गया और पानी से डरने लगा। उसकी हालत लगातार बिगड़ती गई। उसे रीवा के संजय गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां 10 जुलाई को, यानी काटने के लगभग 24 दिन बाद, उसकी मौत हो गई। मौत से पहले वह रेबीज के कारण बुरी तरह तड़प रहा था। घटना: सितंबर 2025 में रीवा जिले के गुढ़ क्षेत्र के बड़ा गांव निवासी सुधीर पांडेय को एक आवारा कुत्ते ने काट लिया। यह कुत्ता रेबीज से संक्रमित था और उसने गांव के 7-8 अन्य लोगों को भी काटा था। सुधीर को कुत्ते ने गर्दन के पास ही काटा था और घाव काफी गहरा था। इलाज: परिजनों ने लापरवाही न करते हुए पास के एक निजी अस्पताल में रेबीज के 4 इंजेक्शन लगवाए। मौत: 25 दिनों तक सब कुछ सामान्य लग रहा था, लेकिन अचानक सुधीर की हालत बिगड़ने लगी। उन्हें रीवा के संजय गांधी अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। जांच में पता चला कि घाव गहरा होने और “हाई रिस्क” कैटेगरी का होने के बावजूद उन्हें रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) नहीं लगाया गया था। साथ ही, घाव की सही तरीके से और सही समय पर सफाई भी नहीं की गई थी। भारत में हर साल रेबीज से 36 फीसदी मौतें
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनियाभर में हर साल लगभग 59,000 लोगों की रेबीज से मौत होती है। यह जानकर हैरानी होगी कि इनमें से 36% से अधिक, यानी करीब 20,000 मौतें अकेले भारत में होती हैं। भारत में हर साल लगभग 2 करोड़ डॉग बाइट के मामले सामने आते हैं, जिनमें 40% पीड़ित 15 साल से कम उम्र के बच्चे होते हैं। एक बड़ी समस्या यह भी है कि कुत्ते के काटने के शिकार 20% से अधिक लोगों को कोई एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) नहीं मिलती। जो लोग इलाज शुरू करते हैं, उनमें से लगभग आधे वैक्सीनेशन का पूरा कोर्स पूरा नहीं करते, जिससे मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। 1. घाव की सफाई में लापरवाही: पहली और सबसे बड़ी गलती
डॉ. पंडवार और डॉ. गुप्ता, दोनों इस बात पर जोर देते हैं कि कुत्ते के काटने के बाद सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम “घाव की तत्काल और सही सफाई” है। डॉ. पंडवार कहते हैं, “डॉग बाइट पर सबसे पहले, चाहे घाव कितना भी छोटा क्यों न हो, उसे तुरंत बहते पानी में साबुन से कम से कम 15 मिनट तक अच्छी तरह धोना चाहिए। यह प्रक्रिया वायरस को स्थानीय स्तर पर ही 99% तक खत्म कर सकती है। इसके बाद बीटाडीन या कोई अन्य एंटीसेप्टिक लगाकर मरीज को तुरंत अस्पताल ले जाना चाहिए।” 2. काटने की जगह का महत्व: सिर और गर्दन सबसे खतरनाक रेबीज का वायरस नसों के जरिए दिमाग की ओर बढ़ता है। इसलिए, काटने की जगह जितनी दिमाग के करीब होगी, खतरा उतना ही ज्यादा होगा। डॉ. गुप्ता बताते हैं, “सिर, चेहरा, गर्दन और हाथ की उंगलियों पर काटना सबसे खतरनाक माना जाता है क्योंकि यहां नर्व्स का घनत्व ज्यादा होता है और दिमाग से दूरी कम होती है। ऐसे मामलों में वायरस को दिमाग तक पहुंचने में बहुत कम समय लगता है, और वैक्सीन को अपना असर दिखाने का मौका ही नहीं मिलता।” तीनों ही केस स्टडी में काटने की जगह गर्दन या सिर के पास थी। 3. जीवनरक्षक RIG की अनदेखी डॉग बाइट को गंभीरता के आधार पर तीन कैटेगरी में बांटा गया है: कैटेगरी 1: कुत्ते का सिर्फ छूना या चाटना (त्वचा पर कोई घाव नहीं)। इसमें कोई जोखिम नहीं होता, सिर्फ जगह को धोना ही काफी है। कैटेगरी 2: हल्की खरोंच या दांत के निशान जिसमें खून न निकले। इसमें एंटी-रेबीज वैक्सीन (ARV) लगवाना अनिवार्य है। कैटेगरी 3: एक या एक से ज्यादा गहरे घाव, खून निकलना या मांस का उखड़ जाना। यह सबसे खतरनाक स्थिति है। डॉ. पंडवार के अनुसार, “कैटेगरी-3 के मामलों में वैक्सीन के साथ-साथ रेबीज इम्युनोग्लोबुलिन (RIG) लगाना अनिवार्य और जीवनरक्षक होता है।” 4. इलाज में देरी या अधूरा कोर्स
रेबीज का औसत इन्कयूबेशन पीरियड (संक्रमण से लक्षण दिखने तक का समय) लगभग 3 महीने होता है, लेकिन यह 1 महीने से लेकर 1 साल तक भी हो सकता है। लोग अक्सर पहला इंजेक्शन लगवाने के बाद लापरवाही बरतते हैं और बाकी डोज समय पर नहीं लगवाते। यह अधूरी सुरक्षा जानलेवा हो सकती है। 5. वैक्सीन की कोल्ड चेन का टूटना
डॉ. गुप्ता एक और महत्वपूर्ण पहलू पर प्रकाश डालते हैं, रेबीज वैक्सीन को 2 से 8 डिग्री सेल्सियस के तापमान पर स्टोर करना अनिवार्य होता है। इसे ‘कोल्ड चेन’ कहते हैं। अगर किसी भी कारण से, जैसे बिजली कटौती, खराब फ्रिज या ट्रांसपोर्टेशन में लापरवाही के चलते वैक्सीन इस तापमान पर स्टोर नहीं हो पाती, तो वह बेअसर हो जाती है। कुत्तों का बर्थ कंट्रोल और टीकाकरण ही समाधान
डॉ. ब्रजेश गुप्ता का मानना है कि इस समस्या का स्थायी समाधान सिर्फ इंसानों के इलाज में नहीं, बल्कि कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने और उन्हें रेबीज मुक्त बनाने में है। “स्ट्रीट डॉग्स की आबादी रोकने के लिए उनके बर्थ कंट्रोल (नसबंदी) पर ध्यान देना होगा। सरकार इसके लिए केंद्र चला रही है, लेकिन इसमें सामाजिक भागीदारी की भी जरूरत है। लोगों को अपनी सोसाइटी और इलाके के कुत्तों का टीकाकरण करवाना चाहिए। एक टीका कुत्ते को 3 साल तक रेबीज से सुरक्षित रखता है।”


