जशपुरनगर में श्रीमद् भागवत कथावाचक करूणा शंकर महाराज ने दावा किया है कि भारत के हिंदू राष्ट्र बनने से वैश्विक परिदृश्य में बड़ा बदलाव आएगा। उन्होंने मीडिया से चर्चा करते हुए कहा कि यदि भारत हिंदू राष्ट्र बनता है, तो विश्व के कम से कम 25 देश स्वयं को हिंदू राष्ट्र घोषित करने के लिए तैयार हैं। महाराज ने भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विश्व में लगभग सभी प्रमुख धर्मों के अपने देश हैं, लेकिन सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए कोई राष्ट्र नहीं है। उनके अनुसार, वर्तमान में हिंदुओं की स्थिति बेघर व्यक्ति जैसी है, इसलिए भारत का हिंदू राष्ट्र बनना अनिवार्य है। उन्होंने इसके लिए पूरे हिंदू समाज से एकजुट होने का आह्वान किया। ‘सनातन धर्म ने सभी को अपनाया’ मनुवाद के आरोपों पर प्रतिक्रि सनातन धर्म ने सभी को अपनायाया देते हुए करूणा शंकर महाराज ने स्पष्ट किया कि ‘मानवता’ ही वास्तविक मनुवाद है। उन्होंने सनातन धर्म का केंद्र बिंदु भगवान विष्णु (नारायण) को बताया। जाति या वर्ण व्यवस्था को उन्होंने समाज के सुव्यवस्थित संचालन की एक प्रणाली के रूप में वर्णित किया, जिसकी तुलना किसी कार्यालय या उद्योग में कार्य विभाजन से की जा सकती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि सनातन धर्म ने कभी जाति के आधार पर भेदभाव की शिक्षा नहीं दी है, और श्रीमद् भागवत का मूल संदेश मानवता को सर्वोच्च धर्म मानता है। महाराज ने कहा कि ईश्वर की पूजा नाम से होती है, जाति से नहीं। उन्होंने संत कबीर और रसखान जैसे उदाहरणों का हवाला देते हुए बताया कि सनातन धर्म ने सभी को अपनाया है। ‘एआई मानव मस्तिष्क की ही उपज’ ज्योतिष में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के उपयोग पर करूणा शंकर महाराज ने कहा कि ज्योतिष जीवन में परिवर्तनों का संकेत देने वाला एक सशक्त विज्ञान है, जिसके लिए वेदों और संहिताओं में वर्णित ज्योतिष विज्ञान का गहन अध्ययन आवश्यक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई मानव मस्तिष्क की ही उपज है और इसकी गणनाएं प्राचीन ज्योतिष विज्ञान पर आधारित होती हैं, इसलिए इसे ज्योतिष से अलग नहीं माना जा सकता। संस्कार के बिना शिक्षा अधूरी इंटरनेट और मोबाइल मीडिया के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि यदि इनका उपयोग अनुशासन के साथ किया जाए तो इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा के साथ संस्कार अनिवार्य हैं। जिस शिक्षा व्यवस्था में संस्कारों के बीज नहीं होते, वह व्यवस्था अधूरी मानी जाती है।


