मदरसा बोर्ड को समाप्त करने का निर्णय वोट बैंक या तुष्टिकरण की सोच से नहीं, बल्कि संतुष्टिकरण के दृष्टिकोण से लिया गया है, ताकि हर समुदाय आगे बढ़ सके। यह कहना है उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड के चेयरमैन मुफ्ती शमून कासमी का। उन्होंने कहा कि सीएम पुष्कर सिंह धामी एक सैनिक पुत्र हैं और आम आदमी की जरूरतों को समझते हैं। यह फैसला अच्छा है। इससे बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा मिलेगी और वे डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस-आईपीएस बनने की राह पर आगे बढ़ सकेंगे। मुख्यमंत्री के ऐलान के बाद उत्तराखंड में अब ‘मदरसा बोर्ड’ नाम से कोई बोर्ड नहीं होगा। आगामी जुलाई सत्र से इसे समाप्त कर सभी मदरसों को उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत लाया जाएगा। ऐसा कदम उठाने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य बन गया है। सरकार के इस फैसले का कासमी ने स्वागत किया और पहली बार दैनिक भास्कर से खास बातचीत में इसके असर और फायदे पर विस्तार से चर्चा की। सवाल-जवाब में पढ़िए पूरी बातचीत… सवाल: मदरसा बोर्ड खत्म कर प्राधिकरण बनाने के फैसले को आप कैसे देखते हैं? जवाब: मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी दूरदर्शी सोच के नेता हैं। उन्होंने निस्वार्थ भाव से राज्य और आम जनमानस के हित में निर्णय लिए हैं। यह फैसला पारदर्शी है और खासतौर पर अल्पसंख्यक बच्चों के लिए उपयोगी साबित होगा। सवाल: देशभर में हंगामा मचा है कि मदरसा बोर्ड खत्म कर मुसलमानों के साथ अन्याय हुआ है। इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? जवाब: यह धारणा पूरी तरह गलत है। आजादी के बाद से मुसलमानों को डराया गया और भ्रम पैदा किया गया। यह फैसला किसी को रोकने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए है। सवाल: इस बदलाव से सबसे बड़ा फायदा क्या होगा? जवाब: पहले मदरसा बोर्ड के प्रमाणपत्रों को समकक्षता नहीं मिलती थी। उनकी वैधता सीमित थी। कई जगह, जैसे पासपोर्ट प्रक्रिया में भी, इनका उपयोग नहीं हो पाता था। अब राज्य बोर्ड से संबद्धता होने पर बच्चों को मान्यता मिलेगी और वे मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे। मुख्यमंत्री ने मुस्लिम समाज के बच्चों को मेनस्ट्रीम से जोड़ने का जो संकल्प लिया है, वह स्वागत ही नहीं, आभार व्यक्त करने योग्य भी है। सवाल: बच्चों के भविष्य पर इसका क्या असर पड़ेगा? जवाब: अब ये बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस और आईपीएस बनने की प्रतिस्पर्धा में उतर सकेंगे। उन्हें अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिलेगा और आगे बढ़ने के समान अवसर मिलेंगे। सवाल: प्राधिकरण के तहत किन कक्षाओं तक शिक्षा आएगी? जवाब: पहली कक्षा से लेकर सीनियर सेकेंडरी तक। पहले तीन विभाग थे- तहतानिया (प्राइमरी), फौकानिया (जूनियर) और आलिया (सीनियर सेकेंडरी)। अब इनकी अलग व्यवस्था की जरूरत नहीं रहेगी, क्योंकि सर्टिफिकेट सीधे राज्य बोर्ड से मिलेंगे और वही सिलेबस लागू होगा। सवाल: क्या यह व्यवस्था सिर्फ मुस्लिम छात्रों तक सीमित रहेगी? जवाब: नहीं, यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है। अब मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी और जैन- इन छह अल्पसंख्यक समुदायों को प्राधिकरण में शामिल किया गया है। यह दायरा बढ़ाने वाला कदम है। सवाल: अभी मदरसों में कितने छात्र पढ़ते हैं और धार्मिक शिक्षा का क्या होगा? जवाब: लगभग 50 हजार से अधिक बच्चे मदरसों में पढ़ रहे हैं। उनकी धार्मिक शिक्षा जारी रहेगी, लेकिन स्कूल समय के बाद। इससे बच्चों का ‘राइट टू एजुकेशन’ सुरक्षित रहेगा और वे आधुनिक शिक्षा से भी जुड़ेंगे। सवाल: इस फैसले को आप किस रूप में देखते हैं? जवाब: यह समान शिक्षा के लक्ष्य की ओर एक बड़ा कदम है। आने वाले समय में उत्तराखंड छोटे राज्यों में एक मॉडल के रूप में उभरेगा, जिसका अन्य राज्य अनुसरण कर सकते हैं। प्राधिकरण बनने से शिक्षा व्यवस्था मजबूत होगी और सभी समुदायों के बच्चों को बराबरी का अवसर मिलेगा। यही इस फैसले की सबसे बड़ी उपलब्धि है। सवाल: मुख्यमंत्री के अन्य फैसलों को आप किस नजर से देखते हैं? जवाब: नकल विरोधी कानून, पारदर्शी भर्ती के माध्यम से 27 हजार से अधिक नौकरियां और समान नागरिक संहिता (UCC) जैसे कदम समानता की दिशा में हैं। UCC को किसी वर्ग विशेष के खिलाफ नहीं समझना चाहिए। इससे महिलाओं से जुड़े कई मुद्दों पर अंकुश लगेगा और समाज मुख्यधारा की ओर बढ़ेगा। जबरन धर्मांतरण के खिलाफ भी कानून लाया गया है। सभी धर्म हृदय परिवर्तन की बात करते हैं, धर्म परिवर्तन की नहीं। पूजा पद्धति अलग हो सकती है, लेकिन मंजिल एक ही है। ——————— ये खबर भी पढ़ें : मदरसा बोर्ड खत्म करने वाला पहला राज्य बना उत्तराखंड: CM बोले- देवभूमि में संकीर्ण मजहबी शिक्षा नहीं मिलेगी; कांग्रेस ने किया था बोर्ड का गठन उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के ऐलान के बाद राज्य में अब “मदरसा बोर्ड” नाम से कोई बोर्ड नहीं होगा। आगामी जुलाई सत्र से इसे खत्म कर सभी मदरसों को उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के अंडर लाया जाएगा। ऐसा कदम उठाने वाला उत्तराखंड देश का पहला राज्य है। (पढ़ें पूरी खबर)


