अफसरों के नखरे उठाने के लिए फंड नहीं होता। उनके खर्च के लिए थाने और पुलिस लाइन से ही बंदोबस्त करना पड़ता है। शाखाओं के प्रभारी छोटे-छोटे काम के लिए पुलिसकर्मियों को प्रताड़ित करते हैं और उगाही का खेल शुरू हो जाता है। ये कहना है नीमच पुलिस लाइन में पदस्थ एक पुलिस जवान का। वो नाम नहीं बताना चाहता, मगर उसने पुलिस लाइन में चल रहे पूरे खेल को भास्कर रिपोर्टर के साथ साझा किया। न केवल एक जवान बल्कि भास्कर रिपोर्टर ने जब पुलिस लाइन में पदस्थ जवान और उनके परिवार से बात की तो सभी ने खुलकर कहा कि यहां ऐसा ही चलता है। दरअसल, इसी पुलिस लाइन में पदस्थ हेड कॉन्स्टेबल होशियार सिंह ने 8 फरवरी को पुलिस कंट्रोल रूम में जहर खाकर खुदकुशी कर ली थी। होशियार सिंह ने सुसाइड से पहले 3 पन्नों का हाथ से लिखा आवेदन डीजीपी, एसपी और जिले के आला अधिकारियों को भेजा था। इसे उनका सुसाइड नोट कहा जा रहा है। इसमें होशियार सिंह ने आरोप लगाते हुए पूरे सिस्टम पर सवाल उठाए हैं। भास्कर ने इस सुसाइड नोट में लिखे 5 गंभीर आरोपों की पड़ताल की। पुलिस लाइन में रहने वाले जवान और उनके परिवार समेत मौजूदा और रिटायर्ड पुलिस अधिकारियों से बात की। पढ़िए रिपोर्ट… पहले जानिए क्या बोला होशियार सिंह का परिवार हेड कॉन्स्टेबल होशियार सिंह की आत्महत्या को तीन दिन बीत चुके हैं। उनका परिवार अंतिम संस्कार के लिए शव लेकर हरियाणा के रेवाड़ी जा चुका है। ये परिवार पुलिस लाइन के ब्लॉक एम के क्वार्टर नंबर 4 में रहता है। भास्कर की टीम जब इस ब्लॉक पर पहुंची तो होशियार सिंह के दरवाजे पर ताला गया था और पानी वाले का बिल चिपका था। होशियार सिंह ने सुसाइड नोट में जो आरोप लगाए हैं। वो ही आरोप परिजन ने भी हरियाणा रवाना होने से पहले लगाए थे। होशियार सिंह की पत्नी ने आरोप लगाया कि ड्यूटी लगाने के लिए भी पुलिस लाइन में लेन-देन होता था। जो पैसे देता था उसकी ड्यूटी नहीं लगती थी या आराम वाली ड्यूटी लग जाती थी। वहीं जो पैसे नहीं देता था उसकी हार्ड ड्यूटी लगाई जाती थी। हालांकि, इन तमाम आरोपों को पुलिस अफसरों ने खारिज किया है। सुसाइड नोट के 5 प्रमुख आरोप और उनकी हकीकत सुसाइड नोट के पांच प्रमुख आरोप को लेकर भास्कर रिपोर्टर ने होशियार सिंह के घर के आसपास रहने वाले पुलिस जवानों के परिजन से बात की। नाम न बताने की शर्त पर सभी ने खुलकर बात की। वहीं उनके इन आरोपों पर पुलिस लाइन के अधिकारियों का पक्ष जाना और फिर पुलिस के रिटायर्ड अधिकारियों से बतौर एक्सपर्ट बात कर समझा कि जो आरोप लगाए हैं उनमें कितनी सच्चाई है? आरोप- 1: क्या पुलिस लाइन में ड्यूटी बेची जाती है?
होशियार सिंह ने सुसाइड नोट में और उनकी पत्नी ने खुले तौर पर आरोप लगाया है कि पुलिस लाइन में ड्यूटी का ‘रेट’ तय है। जो जवान पैसे देते हैं, उनकी ड्यूटी आरामदायक जगहों पर लगाई जाती है या कम लगाई जाती है। जो पैसे नहीं दे पाते, उन्हें बिना आराम दिए एक के बाद एक हार्ड ड्यूटी पर भेजा जाता है। भास्कर की पड़ताल: स्टाफ से ऑफ-द-रिकॉर्ड बात करने पर पता चला कि यह आरोप काफी हद तक सही है। जवानों ने बताया कि यह कोई नई बात नहीं है। पुलिस लाइन में कई जवान उम्रदराज या बीमार होते हैं और फील्ड में 100% नहीं दे पाते। वे हल्की ड्यूटी चाहते हैं, लेकिन इसके लिए शाखा प्रभारी या अधिकारी की ‘सहानुभूति’ जरूरी होती है। इस सहानुभूति की कई ‘अपेक्षाएं’ होती हैं, जिनमें पैसा भी एक है। पुलिस परिवार की महिलाएं बोलीं- भैया, दबाव तो रहता है। हम कुछ बोल नहीं सकते नहीं तो स्टाफ पति के खिलाफ ही हो जाएगा। नौकरी करना मुश्किल कर देगा। कई चीजें तो पति भी हमसे शेयर नहीं करते। वह परेशानी से जूझते रहते हैं। वहीं एक पुलिसकर्मी की कॉलेज जाने वाली बेटी ने बताया, ‘पापा हमेशा मुलजिम पेशी में ही जाते हैं। कई बार उन्होंने बैंक में गार्ड की ड्यूटी लगाने को कहा, लेकिन अफसरों ने नहीं माना।’ अधिकारियों का पक्ष: हेड कांस्टेबल मोहर्रिर (HCM) प्रणव तिवारी इन आरोपों को गलत बताते हैं। उनका कहना है, ‘हम किसी से पैसे नहीं लेते। आरोप तो कोई भी लगा सकता है।’ वहीं, एएसपी नवलसिंह सिसौदिया कहते हैं, ‘कई लोग नौकरी नहीं करना चाहते, इसलिए ऐसे आरोप लगाते हैं।’ भास्कर एक्सपर्ट: सीधे तौर पर ऐसा कहना मुश्किल है, लेकिन यह सच है कि अब जिलों से लेकर थानों तक पोस्टिंग राजनीतिक प्रभाव से होती है। अधिकारियों पर दबाव होता है और वे अपने नीचे वालों पर दबाव बनाते हैं। आरोप- 2: क्या अधिकारियों के खर्चे निकालने के लिए अवैध वसूली होती है?
सुसाइड नोट के अनुसार, आरआई (रिजर्व इंस्पेक्टर) और हेड मोहर्रिर यह कहकर पैसे मांगते थे कि ‘एसपी साहब के कई खर्चे उठाने पड़ते हैं।’ यह एक बेहद गंभीर आरोप है, जो सीधे तौर पर वरिष्ठ अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाता है। भास्कर की पड़ताल: यह आरोप भी काफी हद तक सही पाया गया। जवानों ने बताया कि कई थाना प्रभारियों और आरआई पर ऐसे खर्चे थोपे जाते हैं, जिनका कोई आधिकारिक बजट नहीं होता। जैसे- वीआईपी के आने पर उनके खाने-पीने और ठहरने का इंतजाम, अफसरों के निजी दौरों के लिए वाहनों का प्रबंध, और बाहर जाने के लिए टिकट बुकिंग। यह खर्च अंततः निचले स्तर के कर्मचारियों से किसी न किसी रूप में वसूला जाता है। अधिकारियों का पक्ष: एचसीएम तिवारी और एएसपी सिसौदिया इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। भास्कर एक्सपर्ट: यह सिस्टम का हिस्सा बन चुका है। कई अफसर ईमानदार होने का दावा करते हैं और सीधे पैसे नहीं लेते, लेकिन वे थाना प्रभारियों और अन्य इंचार्ज से दूसरे तरीकों से अपने खर्चे करवा लेते हैं। यह एक अलिखित नियम जैसा है। आरोप- 3: क्या जिम और टेनिस कोर्ट केवल अफसरों के लिए है?
सुसाइड नोट में जिम और टेनिस कोर्ट के निर्माण में भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया है और कहा गया है कि इनका उपयोग केवल अधिकारी ही करते हैं। भास्कर की पड़ताल: भ्रष्टाचार के सीधे प्रमाण तो नहीं मिले, लेकिन यह स्पष्ट दिखा कि इन सुविधाओं में अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच भारी भेदभाव है। पुलिस लाइन की सड़कें कच्ची और जर्जर हैं, क्वार्टरों की हालत दयनीय है, लेकिन वहीं पर एक शानदार रबर कोटेड टेनिस कोर्ट बना है, जिसे ग्रीन नेट से ढका गया है। स्टाफ ने बताया कि यह कोर्ट सिर्फ अफसरों के लिए खुलता है और किसी जवान को वहां जाने की भी इजाजत नहीं है। यह सवाल खड़ा करता है कि जब जवानों के लिए मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं, तो लाखों रुपये खर्च कर टेनिस कोर्ट बनाने की प्राथमिकता क्या थी? भास्कर एक्सपर्ट: सीधे भ्रष्टाचार हुआ हो, यह कहना मुश्किल है, लेकिन जब फंड खर्च करने का अधिकार अधिकारियों के पास होता है, तो वे अपनी सुविधाओं को प्राथमिकता देते हैं। यह उम्मीद करना भी व्यर्थ है कि वे इन सुविधाओं को स्टाफ के साथ साझा करेंगे। आरोप- 4: क्या पुराना रिकॉर्ड देखकर प्रताड़ित किया जाता है?
होशियार सिंह चार दिन से अवकाश पर थे और छुट्टी बढ़वाना चाहते थे, लेकिन उन्हें छुट्टी नहीं दी गई, जिसके चलते उन्होंने यह कदम उठाया। अधिकारियों पर आरोप है कि वे जवानों का पुराना रिकॉर्ड देखकर उनके साथ भेदभाव करते हैं। भास्कर की पड़ताल: यह एक बड़ी और आम समस्या है। अधिकारी आज भी होशियार सिंह की मौत के कारणों की जांच करने के बजाय उनका पुराना रिकॉर्ड खंगाल रहे हैं कि उसे कब सजा मिली, कब वह बर्खास्त हुआ? सुसाइड नोट के आरोपों को गंभीरता से लेने के बजाय, मामले को व्यक्ति के ‘खराब रिकॉर्ड’ से जोड़कर खारिज करने की कोशिश की जा रही है। भास्कर एक्सपर्ट: यह विभाग की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक है। यदि किसी जवान ने पहले कोई गलती की है, तो उसे हर बार उसी नजर से देखा जाता है। उसे उसके अवकाश के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। सरकार ने हर हफ्ते एक दिन की छुट्टी का रोस्टर बनाया था, लेकिन वह आज तक ठीक से लागू नहीं हो पाया। आरोप- 5: क्या जांच में उलझाकर लाइन भेजकर प्रताड़ित करते हैं?
अधिकारियों पर यह भी आरोप है कि वे किसी कर्मचारी से नाराज होने पर उसे झूठी शिकायतों और जांचों में उलझाकर ‘लाइन हाजिर’ कर देते हैं, जो एक तरह की मानसिक प्रताड़ना है। एक सक्रिय फील्ड कर्मचारी को लाइन में बैठाकर हल्की ड्यूटी कराना उसे मानसिक रूप से तोड़ देता है। भास्कर की पड़ताल: यह आरोप भी सही पाया गया। कई बार अधिकारी अपनी गलती छिपाने के लिए छोटी-छोटी बातों पर गंभीर कार्रवाई कर देते हैं, जैसे स्थाई वेतनवृद्धि रोकना या लाइन में भेजकर आरआई को निर्देशित करना कि ‘इसकी ड्यूटी सिर्फ मुलजिम पेशी में लगाओ।’ इससे कर्मचारी डिप्रेशन में चला जाता है, उसका प्रमोशन रुक जाता है और उसे आर्थिक नुकसान होता है। भास्कर एक्सपर्ट: कर्मचारियों के डिप्रेशन और आत्महत्या जैसे कदमों के पीछे जांच एक बड़ा कारण है। अधिकारी कई बार द्वेष भावना से कर्मचारी को जांच में ऐसा उलझाते हैं कि वह मानसिक रूप से टूट जाता है। यह प्रताड़ना का सबसे आम हथियार है। जांच, कार्रवाई और तनाव में काम करना आम बात है। आज के समय में पोस्टिंग राजनीतिक पसंद-नापसंद या पैसों के दम पर होती है। इस खबर पर आप अपनी राय दे सकते हैं… इससे जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें…
1. हेड कॉन्स्टेबल की बेटी बोली-पापा दबाव में टूट गए नीमच में हेड कॉन्स्टेबल होशियार सिंह की मौत के मामले में बेटी के बयान ने पुलिस सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। बेटी अर्पिता यादव का कहना है कि उनके पिता पर लगातार मानसिक दबाव बनाया जा रहा था। पढ़ें पूरी खबर… 2. पुलिस बिकी हुई है…कहकर हेड कॉन्स्टेबल ने की खुदकुशी अपने सुसाइड नोट में होशियार सिंह ने अपने ही विभाग के अधिकारियों पर प्रताड़ना, भ्रष्टाचार और अवैध वसूली के गंभीर आरोप लगाए हैं। होशियार सिंह की मौत ने पूरे पुलिस महकमे को कटघरे में खड़ा कर दिया है। पढ़ें पूरी खबर…


