किसान-मजदूर संगठनों ने केंद्र सरकार को दी चेतावनी:बोले- नीतियां वापस नहीं ली तो होगा बड़ा संघर्ष, ​​निजीकरण पर रोक और एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग

देश के किसान और मजदूर संगठनों ने एक बार फिर केन्द्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। केन्द्रीय श्रमिक संगठनों की समन्वय समिति के बैनर तले संयुक्त किसान मोर्चा और कई बड़े मजदूर संगठनों ने मिलकर उदयपुर में प्रदर्शन किया। टाउल हॉल से कलेक्ट्रेट तक आक्रोश रैली निकाली गई। सरकार के खिलाफ नारेबाजी कर प्रदर्शन के बाद राष्टपति के नाम ज्ञापन भी सौंपा गया। इस प्रदर्शन में हाथों में तख्तियां लिए महिलाएं भी शामिल हुई और महंगाई से राहत दिलवाने की मांग की। संगठनों का कहना है कि सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को निजी हाथों में बेच रही है। इससे रोजगार के अवसर खत्म हो रहे हैं और देश की आत्मनिर्भरता को खतरा पैदा हो गया है। इंटक प्रदेशाध्यक्ष जगदीश राज श्रीमाली ने बताया- रेलवे, बिजली, बैंक और बीमा जैसे सेक्टर में निजीकरण की वजह से आम कर्मचारियों का भविष्य अधर में लटक गया है। खासकर आशा सहयोगिनी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और मिड-डे मील से जुड़े कर्मचारियों को न तो सही वेतन मिल रहा है और न ही उन्हें सामाजिक सुरक्षा दी जा रही है। सीटू के हीरा लाल सालवी ने बताया कि सरकार ठेका प्रथा को बढ़ावा देकर मजदूरों का शोषण कर रही है। किसानों की नाराजगी एमएसपी को लेकर बनी हुई है। किसान नेताओं का कहना है कि सरकार अपने लिखित वादों से पीछे हट गई है। किसानों की मांग है कि उन्हें एमएसपी की कानूनी गारंटी दी जाए ताकि वे बाजार के भरोसे न रहें। बिजली संशोधन बिल 2023 को लेकर भी विरोध तेज है। किसानों को डर है कि इस कानून के आने से खेती की लागत और बढ़ जाएगी और बिजली महंगी हो जाएगी। किसान आंदोलन के दौरान दर्ज मुकदमों की वापसी और शहीद किसानों के परिवारों के लिए न्याय की मांग भी अभी तक अधूरी है। संगठनों ने भारत और अमेरिका के बीच होने वाले व्यापार समझौते पर भी सवाल उठाए हैं। इस तरह के समझौते बिना किसी पारदर्शिता के किए जा रहे हैं। इसका सीधा फायदा बड़ी विदेशी कंपनियों को होगा। इससे हमारे देश के किसानों को मिलने वाली सब्सिडी पर बुरा असर पड़ सकता है। बीजों पर से किसानों का हक छिन सकता है। यह समझौता देश की खाद्य सुरक्षा और संप्रभुता से सीधा खिलवाड़ है। किसान और मजदूर संगठनों ने सरकार के सामने कुछ प्रमुख शर्तें रखी हैं। इसमें सबसे बड़ी मांग यह है कि मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 26 हजार रुपए महीना की जाए और कम से कम 10 हजार रुपए पुरानी पेंशन तय हो। साथ ही, विवादित श्रम कानूनों और वीबी जी रामजी अधिनियम को वापस लेने की मांग की गई है। सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंपने पर पूरी तरह रोक लगाने की बात कही गई है। बीमा कर्मचारी यूनियन के मोहन सिंयाल ने चेतावनी देते हुए कहा- मजदूर और किसान इस देश की बुनियाद है। अगर उनकी मांगों पर जल्द ही सकारात्मक फैसला नहीं लिया गया तो पूरे देश में एक बड़ा साझा आंदोलन खड़ा किया जाएगा। संगठनों ने कहा है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज को दबाया नहीं जा सकता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए यह संघर्ष जारी रहेगा।

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