श्रीनाथजी के आंगन में उड़ी फागुन की गुलाल:मंदिर में मनोरथ, तिलकायत ने प्रभु के संग खेले रंग; नाथद्वारा की गलियों में रसिया गायन

फागुन आते ही राजसमंद के श्रीनाथजी मंदिर में उत्सव शुरू हो जाता है। मंदिर में रसिया गान के स्वर सुनाई दे रहे हैं। फाग की उमंग भक्ति के रंग में रंगी दिखाई देती है। भगवान श्रीनाथजी की सेवा-पूजा को स्वरूप बदलता है। फागुन के महीने में देशभर से बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीनाथजी के दर्शन करने पहुंचते हैं और फाग उत्सव का हिस्सा बनते हैं। पुष्टिमार्ग की प्रधानपीठ श्रीनाथजी मंदिर नाथद्वारा में गुरुवार का दिन खास रहा। श्रीजी प्रभु और लाडले लाल प्रभु का गुलाल कुंड मनोरथ भव्य रहा। भावपूर्ण तरीके से भगवान को गुलाल अर्पित की गई। मंदिर के तिलकायत राकेश महाराज और और तिलकायत पुत्र विशाल बावा ने भगवान को चोवा, चंदन, गुलाल और अबीर का अर्पण कर लाड़ लड़ाए। वही गुलाल कुंड के दर्शन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। मंदिर परिसर भक्तिरस और उत्साह से सराबोर हो उठा। देश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु गुलाल के रंग में रंगे दिखे। श्रीनाथजी के आंगन में भक्ति का रंग.. श्रीनाथजी को अबीर-गुलाल से सजाया मनोरथ के दौरान प्रभु को अबीर-गुलाल से सजाकर फाग खेली गई। तिलकायत ने प्रभु की आरती उतारकर सेवा समर्पित की। उपस्थित वैष्णव जन भी प्रभु के रंग में रंगे नजर आए और पूरा वातावरण रसमय एवं आनंदमय हो गया। इस अवसर पर विशाल बावा ने कहा- फागुन मास की सेवा में साक्षात निकुंज नायक प्रभु वैष्णवों के साथ फाग खेलते हैं। समस्त पुष्टि सृष्टि को आनंद से भर देते हैं। ऐसा अलौकिक आनंद देवताओं के लिए भी दुर्लभ है, जो प्रभु की विशेष कृपा से ही भक्तों को प्राप्त होता है। इस अवसर पर मंदिर के अधिकारी सुधाकर उपाध्याय, मंदिर के मुख्य प्रशासक भारत भूषण व्यास, श्रीनाथजी मंदिर मंडल के सीईओ श्री जितेंद्र पांडे, तिलकायत के मुख्य सलाहकार अंजन शाह, मंदिर मंडल के सदस्य समीर चौधरी, सहायक अधिकारी अनिल सनाढ्य, तिलकायत सचिव लीलाधर पुरोहित, समाधानी उमंग मेहता, मीडिया प्रभारी गिरीश व्यास, कैलाश पालीवाल, कल्पित, प्रतीक उपस्थित रहे। नाथद्वारा में रसिया गायन के रंग.. नाथद्वारा में फागुन के दौरान रसिया गायन में भी श्रद्धालु खूब आनंद पाते हैं। रसिया गायन फागुन में नाथद्वारा में कई जगह होता है। यह केवल एक साधारण गायन नहीं, बल्कि भगवान श्रीनाथजी के साथ खेली जाने वाली सखा-भाव की जीवंत लीला है।

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