दौसा जिले के मानपुर कस्बे में गुरुवार को हिन्दू सम्मेलन आयोजित किया गया। इसे लेकर सुनारों की बगीची से रवाना हुई कलश व शोभायात्रा नगर परिक्रमा करते हुए कचहरी मैदान पहुंची। जहां सतलोक आश्रम निकटपुरी के संत रामेश्वर साहिब महाराज के सान्निध्य में सम्मेलन आयोजित किया गया। मंदिर, कुआं और श्मशान पर भेद खत्म सम्बोधित करते हुए मुख्य वक्ता सामाजिक कार्यकर्ता मोहन सिंह ने कहा कि कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी व नागरिक अनुशासन को समाज के बीच लागू मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने कहा कि एक मंदिर, एक कुआं और एक शमशान पर सभी भेद समाप्त हो जाते हैं, यही समरसता का वास्तविक स्वरूप है। हिंदू समाज समर्थ भारत की नींव मुख्य वक्ता ने कहा कि संगठित हिंदू समाज ही समर्थ भारत की नींव है। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिंदुत्व किसी जाति तक सीमित है और न ही केवल पूजा पद्धति तक, बल्कि यह एक जीवन पद्धति है, जिसका मूल सूत्र सर्वे भवन्तु सुखिनः और वसुधैव कुटुम्बकम् है। उन्होंने कहा कि समय के साथ चुनौतियों और शक्तियों का स्वरूप बदलता रहता है, लेकिन हिंदू चेतना सनातन बनी रहती है। राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों को समझें मोहन सिंह ने आह्वान किया कि आज आवश्यकता है स्वदेशी अपनाने की, अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करने की तथा राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों को समझने की। भविष्य के भारत के निर्माण के लिए पंच परिवर्तन को आधार बनाकर कार्य करने का आह्वान किया गया। संगठित, स्वाभिमानी और संस्कारयुक्त समाज ही भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने की दिशा में अग्रसर कर सकता है। उन्होंने कहा कि नागरिक कर्तव्यों और पर्यावरण संरक्षण पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि लाल बत्ती पर रुकना, रेल यात्रा में टिकट लेना, जल का सीमित उपयोग करना, पॉलीथिन का त्याग करना और प्रदूषण को रोकना प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। ऐसे छोटे-छोटे अनुशासन ही बड़े सामाजिक परिवर्तन का आधार बनते हैं। परिवारों से संस्कार भाव विकसित हों भावना शर्मा ने कुटुंब प्रबोधन पर बल देते हुए कहा कि प्रत्येक घर में सांस्कृतिक प्रतीकों का सम्मान, तुलसी का पौधा, स्वदेशी परिधान और मातृभाषा में संवाद होना चाहिए। उन्होंने भोजन के समय मोबाइल के स्थान पर पारिवारिक संवाद को प्राथमिकता देने जैसे संस्कारों को जीवन में अपनाने का आग्रह किया। सम्मेलन की अध्यक्षता कन्हैयालाल सैनी ने की। इस दौरान बड़ी तादात में महिला-पुरुष मौजूद रहे।


