भास्कर न्यूज | दंतेवाड़ा जिले में ट्राइबल विभाग के आश्रमों की स्थिति एक बार फिर सवालों के घेरे में है। कुआकोंडा ब्लॉक के गोंगपाल बालक आश्रम में पिछले छह महीनों में दो छात्रों की मौत हो चुकी है, लेकिन विभाग अब तक गंभीर नहीं दिख रहा। बुधवार रात आश्रम के दर्जनों बच्चे बरामदे में एक साथ पहुंचे और अपनी पीड़ा बयां की। बच्चों ने बताया कि उन्हें भरपेट भोजन नहीं मिलता, फटी चादरें दी गई हैं और बीमार होने पर इलाज की जगह डांट-फटकार मिलती है। करीब 100 सीटर इस आश्रम में प्राथमिक और मिडिल स्कूल के लगभग 75 बच्चे रह रहे हैं। बच्चों का आरोप है कि आश्रम के दोनों अधीक्षक रात को रुकते ही नहीं। छह भृत्य पदस्थ हैं, लेकिन रात में मुश्किल से एक या दो ही मौजूद रहते हैं। तेल-साबुन जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए भी बच्चों को घर से लाने को कहा जाता है। खाने के मीनू का पालन हो रहा है या नहीं, इसकी कोई निगरानी नहीं होती। निर्माण व खरीदी में दिलचस्पी, बच्चों पर कम ध्यान: ट्राइबल विभाग पिछले 20 वर्षों में कई बार विवादों में रहा है। फर्जी टेंडर, मरम्मत राशि में गड़बड़ी और कंप्यूटर, कुकर, चादर जैसी खरीदी में अनियमितताओं के आरोप लगते रहे हैं। जनपद सदस्य वीरेंद्र तामो ने कहा कि शिकायतों के बाद वे स्वयं आश्रम पहुंचे, जहां बच्चों ने समस्याएं बताईं। इधर सहायक आयुक्त राजीव नाग ने स्वीकार किया कि पहले भी शिकायतें मिली थीं। संबंधितों को नोटिस जारी किया जा रहा है और जांच के बाद कार्रवाई की जाएगी। सवाल यह है कि दो मासूमों की मौत के बाद भी अगर व्यवस्था नहीं सुधरती, तो जिम्मेदारी तय कब होगी? नियम के मुताबिक पोटाकेबिन और आश्रमों में अधीक्षकों का रात में रुकना अनिवार्य है, लेकिन जिले के अधिकांश आश्रमों में इसका पालन नहीं हो रहा। दर्ज संख्या और वास्तविक उपस्थिति में भी अंतर है। ब्लॉक स्तर पर मंडल संयोजक नियुक्त होने के बावजूद भोजन, साफ-सफाई, स्वास्थ्य सुविधाओं की नियमित मॉनिटरिंग नहीं हो रही। छात्रों के अनुसार, अधिकारी कभी भी रात में अचानक निरीक्षण करने नहीं आते। दिन में जब निरीक्षण होता है तो पहले से फोन पहुंच जाता है और व्यवस्था अस्थायी रूप से दुरुस्त कर ली जाती है। आरोप है कि वर्षों से रात में आश्रम से नदारद अधीक्षक अफसरों से सांठगांठ कर कार्रवाई से बचते रहे हैं।


