देश के पहले यू-ट्यूबर गांव के रूप में पहचान बनाने वाला रायपुर जिले का तुलसी गांव फिर पुराने ढर्रे पर पहुंच गया है। जिस गांव में हर चौथे घर से कैमरा ऑन होता था, वहां अब लंबे समय से वीडियो निर्माण ठप पड़ गया है। इसका कारण कंटेंट क्रिएटरों का शहरों में शिफ्ट होना है। इसके चलते साल 2023 में जिला प्रशासन की मदद से तैयार किया गया हमर फ्लिक्स स्टूडियो भी बंद पड़ा है। स्टूडियो के बाहर ताला बंद है और जिस कमरे में स्टूडियो बनाया गया है, वहां अब सरपंच बैठते हैं। रायपुर से करीब 50 किमी दूर तुलसी गांव की आबादी 10 हजार है। यहां 3800 के आसपास वोटर हैं। साल 2018 के आसपास यू-ट्यूब कंटेंट क्रिएशन की शुरुआत की थी। धीरे-धीरे यहां दर्जनों चैनल बने और गांव को ‘यू-ट्यूबर गांव’ के नाम से राष्ट्रीय पहचान मिली। स्थानीय भाषा और ग्रामीण जीवन पर आधारित वीडियो को देशभर में पसंद किया गया, लेकिन समय के साथ हालात बदल गए। स्थानीय निवासी रोहित आडिल बताते हैं कि गांव में जो कोई आता, वो लोगों के घरों को देखकर पूछता- यू-ट्यूब से कितना कमाते हो? और यही बात ग्रामीणों को पसंद नहीं आती थी। इसका बड़ा कारण ये था कि यहां के स्थानीय निवासी ववीडियो कंटेंट के जरिए अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन करते थे, न कि वो इनके लिए कमाई का जरिया था। इसी तरह के अन्य विवाद भी गांव में धीरे-धीरे होने लगे और इसके चलते वीडियो कंटेंट बनना बंद हो गया। बीइंग छत्तीसगढ़िया चैनल से मिली गांव को पहचान तुलगी गांव को असली पहचान दी ‘बीइंग छत्तीसगढ़िया’ नामक यूट्यूब चैनल ने। साल 2018 में इस चैनल की शुरुआत कंटेंट क्रिएटर ज्ञानेंद्र शुक्ला और जय वर्मा ने मिलकर की। यह चैनल छत्तीसगढ़ी भाषा में बने वीडियो की वजह से तेजी से लोकप्रिय हुआ। चैनल पर अब तक तीन सौ से अधिक वीडियो अपलोड हो चुके हैं। वहीं इसके सब्सक्राइबर की संख्या एक लाख से अधिक पहुंच चुकी है। गांव के कई कलाकार और युवा इस चैनल के वीडियो में नजर आए, जिससे तुलसी गांव चर्चा में आया। वो सब कुछ जो आपको जानना जरूरी है स्टूडियो कैसा था और क्या-क्या सुविधाएं थीं?
– साल 2023 में जिला प्रशासन की ओर से निजी कंपनी की मदद से सीएसआर फंड से यहां हमर फ्लिक्स नामक स्टूडियो का निर्माण किया। स्टूडियो आधुनिक टेक्नोलॉजी पर बेस्ड था। कैमरे में डीएसएलआर और ड्रोन दोनों थे। कितने कंटेंट क्रिएटर थे, अब क्या कर रहे?
– शुरुआती दौर में दो लोगों ने मिलकर कंटेंट बनाने का काम शुरू किया। धीरे-धीरे इनकी संख्या 15 से अधिक हो गई। इन सभी के अपने-अपने यू-ट्यूब चैनल बने हुए हैं। अधिकांश युवा अब रायपुर बेस्ड हो चुके हैं। इनमें से कुछ तो मुंबई शिफ्ट हो गए हैं। जो वीडियो में काम करते थे, उनका क्या हुआ?
-कंटेंट क्रिएटर युवाओं के साथ गांव के ही ग्रामीण काम कर रहे थे। इसमें कामकाजी महिलाएं, बुजुर्ग, युवा और छात्र शामिल थे। कुछ ऐसे लोग भी थे, जो शौकिया तौर पर वीडियो में काम करते थे। अब अधिकांश लोग अपने रोज के कामकाज में ही व्यस्त हो चुके हैं।
गांव के सरपंच, यू-ट्यूब की शुरुआत करने वाले युवा और वीडियो में काम करने वालों का दर्द उन्हीं की जुबानी… सरपंच बोले- एक साल से गांव के स्टूडियो में कोई नहीं आया
तुलसी गांव के सरपंच गुलाब चंद आडिल ने बताया कि नए-नए वीडियो बनने से इस गांव को पहचान मिली थी। अब यह पूरी तरह से बंद है। स्टूडियो में तो पिछले एक साल से कोई झांकने तक नहीं गया। क्या सामान था, क्या नहीं है, किसी को नहीं पता। प्रशासन भी ध्यान नहीं देता।
कई विवाद हुए, मनमुटाव भी हुआ, इसलिए गांव से पलायन
कंटेंट क्रिएटर जय वर्मा ने बताया कि गांव को जब पहचान मिली तो कई तरह के मनमुटाव भी होने लगे। यू-ट्यूब चैनल के जरिए भारी कमाई हो रही है, इस तरह मैसेज फैलाया गया। इस तरह धीरे-धीरे आपसी विवाद होने लगे और युवा कंटेंट क्रिएटर शहरों की ओर कूच कर गए। नहीं बन रहा कोई वीडियो, अब फैक्ट्री में नौकरी कर रहा
मैंने करीब 12 से 15 वीडियो में काम किया है। काम में मजा भी आता था और पहचान भी मिलती थी। दो साल से कोई वीडियो नहीं बन रहा है। इसलिए मैं पास की फैक्ट्री में काम में जाता हूं। गाड़ी भी चला लेता हूं।
– डागेश वर्मा, वीडियो में काम करने वाला ग्रामीण


