पूरी रात हमारी टीम में कोई भी सोया नहीं। हम रात भर तैयारी करते रहे। हम मध्य प्रदेश में इतिहास बनाने जा रहे थे। 5 घंटे की सर्जरी के बाद आखिर हमने प्रदेश में पहली बार एक बीमार दिल की जगह हेल्दी हार्ट लगाने में कामयाबी हासिल की। भोपाल एम्स के सर्जन डॉ. विक्रम वट्टी ये कहते हुए अपनी पूरी टीम पर बेहद गर्व महसूस करते हैं। वट्टी उस टीम का हिस्सा रहे हैं, जिसने कुछ दिन पहले मध्य भारत का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट भोपाल एम्स में किया गया है। इसमें नर्मदापुरम के रहने वाले 53 साल के दिनेश मालवीय के सीने में सागर निवासी 61 साल के पुजारी बलिराम कुशवाह का दिल लगाया गया। दिनेश का हार्ट 20 फीसदी ही काम कर रहा था। डॉक्टर्स के मुताबिक, हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद अब दिनेश की उम्र 15 साल और बढ़ गई है। उन्हें 14 फरवरी को अस्पताल से छुट्टी मिल गई। 10 फरवरी को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने भी एम्स जाकर दिनेश मालवीय से मुलाकात की थी। दरअसल, मध्यप्रदेश के प्राइवेट अस्पतालों में पिछले कुछ सालों में हार्ट ट्रांसप्लांट के तीन ऑपरेशन हुए हैं। ये ऑपरेशन दिल्ली, मुंबई या चेन्नई से आए डॉक्टरों के सपोर्ट से हुए हैं। एम्स भोपाल में हुआ ये पहला ऑपरेशन है, जो सरकारी अस्पताल में हुआ है और बिना किसी बाहरी मदद के एम्स के ही डॉक्टरों ने इसे अंजाम दिया है। कैसे हुई ये सर्जरी, डॉक्टर्स के सामने क्या चुनौतियां थी, इसके लिए कितने दिनों से तैयारी की जा रही थी? भास्कर ने इस सर्जरी से जुड़े 4 डॉक्टरों से पूरी प्रोसेस समझी, पढ़िए संडे स्टोरी…. 5 पॉइंट्स में जानिए, कैसे हुआ हार्ट ट्रांसप्लांट 1. एक साल पहले से तैयारियां
एम्स के हार्ट सर्जन डॉ. योगेश निवारिया बताते हैं कि हमने एम्स में हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारी करीब 1 साल पहले शुरू की थी। पहले मैन पावर की जरूरत, ट्रेनिंग का प्लान बनाया गया। इसके बाद परमिशन की कवायद शुरू हुई। अप्रैल 2024 में स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गेनाइजेशन (सोटो) से हार्ट ट्रांसप्लांट को परमिशन देने के लिए आवेदन दिया। परमिशन मिलने में 4-5 महीने का वक्त लगा। इस बीच एम्स में ट्रांसप्लांट से जुड़ी मशीनरी की कमी पूरी की गई। आखिरकार अक्टूबर में परमिशन मिल गई। 2. ट्रेनिंग के लिए चेन्नई गए
टीम में शामिल डॉ. सुरेंद्र यादव बताते हैं कि ट्रेनिंग बहुत जरूरी थी। इसके लिए हमने अस्पताल की सर्चिंग शुरू की। ये तय हुआ कि ट्रेनिंग के लिए भोपाल एम्स की टीम एमजीएम हेल्थकेयर, चेन्नई जाएगी। इस इकलौते सेंटर में एक साल में 120 से 150 हार्ट ट्रांसप्लांट होते हैं। यह संख्या एक साल में देशभर में होने वाले हार्ट ट्रांसप्लांट की 40 से 50 फीसदी है। नवंबर 2024 में एम्स के डॉक्टर्स, सर्जन और नर्सेज की 7 लोगों की टीम चेन्नई गई। वहां 15 दिन की ट्रेनिंग हुई। 3. हार्ट ट्रांसप्लांट के 6 ऑपरेशन देखे
डॉ. सुरेंद्र यादव बताते हैं कि चेन्नई में ट्रेनिंग के दौरान हमारी टीम ने हार्ट ट्रांसप्लांट के करीब 6 ऑपरेशन देखे। हर एक ऑपरेशन की चुनौतियां अलग-अलग थीं, क्योंकि ट्रांसप्लांट के दौरान मरीज की कंडिशन मायने रखती है। वे बताते हैं कि ट्रेनिंग के दौरान एक वाकया ऐसा भी हुआ कि ट्रांसप्लांट की पूरी प्रोसेस को रोकना पड़ा। दरअसल, डोनर का हार्ट लाते वक्त डैमेज हो गया। इससे हमें ये सीखने को मिला कि हर कंडिशन के लिए रेडी रहना जरूरी है। टीम ने ये भी देखा कि हार्ट ट्रांसप्लांट के दौरान कौन सी दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है। 4. हेल्दी हार्ट की तलाश
टीम के डॉ. एम किशन ने बताया- हमारी पूरी तैयारी थी। ट्रांसप्लांट के लिए उपकरण, मैन पावर भी पूरा हो चुका था। अब पेशेंट और डोनर की तलाश थी। 22 जनवरी की शाम वॉट्सएप ग्रुप पर एक मैसेज आया कि जबलपुर में एक ब्रेन डेड व्यक्ति है, जिसके बॉडी पार्ट परिजन डोनेट करना चाहते हैं। इस मैसेज को देखकर हमारी टीम एक्टिव हुई। रात 9 बजे तक हमने पूरी प्रोसेस कर ली। इधर, एक टीम जबलपुर रवाना हुई। दूसरी टीम ने रिसीवर को नर्मदापुरम से बुलाया। रात 10.30 बजे तक पेशेंट एम्स, भोपाल आ गया था। जबलपुर पहुंचकर हमारी टीम ने ब्रेन डेड डोनर के हार्ट की कंडिशन देखी। दरअसल, हार्ट ट्रांसप्लांट से पहले देखा जाता है कि हार्ट के वॉल्व में कोई ब्लॉकेज न हो। 5. पूरी मशीनरी को एक्टिव किया
डॉ. विक्रम वट्टी ने कहा- हार्ट ट्रांसप्लांट करने का काम हमारा था। मगर, डोनर के हार्ट को यहां तक लाने में पूरी मशीनरी को शामिल करना जरूरी था। इसके लिए सबसे पहले सोटो से परमिशन के लिए अप्लाय किया। वहां से परमिशन मिलने के बाद जबलपुर जाने के लिए हमारी टीम को एक हेलिकॉप्टर की जरूरत थी। राज्य सरकार ने पीएम श्री योजना के तहत इसे मुहैया कराया। इस प्रक्रिया में जबलपुर और भोपाल जिले की पुलिस, स्वास्थ्य विभाग, प्रशासनिक मशीनरी पूरी तरह शामिल थी। दोनों शहरों में ग्रीन कॉरिडोर बनाए गए। भोपाल एयरपोर्ट से एम्स की दूरी 21 किलोमीटर है और 11 मिनट में हम डोनर का हार्ट लेकर अस्पताल पहुंच गए थे। ऑपरेशन के दौरान और बाद के चैलेंज 1. ब्लीडिंग: डॉ. योगेश कुमार निवारिया कहते हैं कि जब हमने रिसीवर का हार्ट उसके शरीर से अलग किया तो उसे हार्ट-लंग्स मशीन का सपोर्ट दिया गया, ताकि उसकी बॉडी में ब्लड फ्लो बना रहे। इसके बाद जो डोनर का हार्ट था, उसे रिसीवर के हार्ट से रिप्लेस किया। इसके बाद हमने हार्ट की नसों को जोड़ने का काम शुरू किया। इस दौरान हैवी ब्लीडिंग का खतरा होता है, क्योंकि सभी खून की नसें रहती हैं। 2. हार्ट पंपिंग: हार्ट ट्रांसप्लांट तो हो चुका था, मगर हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि हार्ट नई बॉडी के हिसाब से फंक्शन करे। हमने 24 घंटे तक पेशेंट को अंडर ऑब्जर्वेशन रखा। उसे वेंटिलेटर का सपोर्ट दिया था। इसके बाद हमने देखा कि हार्ट खुद-ब-खुद पंपिग करने लगा और खून को बॉडी में पहुंचाने लगा। इसके बाद वेंटिलेटर सपोर्ट हटाया गया और पेशेंट को आईसीयू में शिफ्ट किया। 3. रिकवरी: ट्रांसप्लांट में एक तिहाई पार्ट सर्जरी है, बाकी रिकवरी है। रिसीवर की बॉडी रिएक्ट कैसे कर रही है, इसी पर सबकुछ निर्भर है। हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद शुरुआत के 7 दिन बहुत मुश्किल होते हैं। पेशेंट के हार्ट को सपोर्ट करने वाली दवाइयां दी जाती हैं। रोग प्रतिरोधक क्षमता कम करते हैं तो मरीज को इन्फेक्शन होने के चांस भी रहते हैं। हमने पेशेंट को पूरे 18 दिन तक अपनी निगरानी में रखा। अब जानिए, कैसी है दिनेश मालवीय की हालत
दिनेश मालवीय अपने घर पहुंच चुके हैं। उन्हें अभी किसी से भी मिलने के लिए डॉक्टरों ने मना किया है। उनका इम्यून सिस्टम कमजोर है। डॉ. सुरेंद्र यादव ने कहा कि हम लोग लगातार उनके संपर्क में हैं। उन्हें बोलने में थोड़ी परेशानी है, लेकिन और कोई समस्या नहीं आ रही है। हमने उन्हें बाहर आने-जाने और ज्यादा चलने-फिरने से मना किया है। ऐसी किसी प्रकार की एक्टिविटी करने से मना कर दिया है, जिससे दिल की धड़कन एकदम तेज हो जाए। इसलिए प्रदेश का पहला हार्ट ट्रांसप्लांट ऑपरेशन
मध्यप्रदेश में पहले भी हार्ट ट्रांसप्लांट ऑपरेशन हुए हैं, लेकिन ये ऑपरेशन न तो किसी सरकारी अस्पताल में हुए हैं और न ही मध्यप्रदेश के डॉक्टर्स ने किए हैं। मुंबई, चेन्नई या दिल्ली से आने वाले स्पेशलिस्ट ने इंदौर के निजी अस्पतालों में इन्हें अंजाम दिया है। भोपाल एम्स में हुए ऑपरेशन में अस्पताल भी मध्यप्रदेश का है और डॉक्टर्स की टीम भी। खास बात ये है कि प्राइवेट अस्पताल में इस ऑपरेशन में 35-40 लाख रुपए का खर्च आता है, जबकि सरकारी में ये ऑपरेशन 6 लाख रुपए में हुआ है। गांधी मेडिकल कॉलेज में भी जल्द ट्रांसप्लांट की सुविधा
भोपाल एम्स में सफल हार्ट ट्रांसप्लांट के बाद अब मध्यप्रदेश सरकार ने भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में भी हार्ट ट्रांसप्लांट की तैयारियां शुरू की हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य आयुक्त तरूण राठी ने कहा कि हमने गांधी मेडिकल कॉलेज को हार्ट ट्रांसप्लांट के लिए निर्देशित किया है। डॉक्टर्स को इसकी तैयारी करने के लिए कह दिया गया है। कुछ समय में यहां भी इसकी सुविधा शुरू हो जाएगी। साथ ही ये कोशिश भी है कि हार्ट ट्रांसप्लांट को आयुष्मान योजना में शामिल किया जाए। ये खबर भी पढ़ें… MP के सागर में सबसे ज्यादा चेस्ट पेन के केस मध्यप्रदेश में सबसे अधिक हार्ट की समस्याएं सागर जिले के लोगों को आई है। पिछले एक साल में यहां 4,967 लोगों ने चेस्ट पेन के कारण 108 एंबुलेंस को बुलाया। इस श्रेणी में दूसरे स्थान पर रीवा है, जहां 3,000 लोगों ने एंबुलेंस की मदद ली। तीसरे स्थान पर जबलपुर रहा, जहां 2,196 लोगों ने चेस्ट पेन के मामले में एंबुलेंस को कॉल किया। पढ़ें पूरी खबर…


