इंदौर में 15 दिन के नवजात को जानलेवा इन्फेक्शन हो गया। उसकी पूरी पीठ और निचले हिस्से की त्वचा काली पड़ गई और जख्म का रूप लेकर फैलने लगी। बच्चे की पीठ पर बड़ा गड्ढा हो गया, जिसके कारण उसका एक करवट पर लेटाकर इलाज करना पड़ा। 22 दिनों तक एनआईसीयू में रहते हुए बच्चे ने जिंदगी और मौत से संघर्ष किया। इस दौरान उसकी दो सर्जरी की गईं। चूंकि बच्चा नाजुक था, उसकी अपनी त्वचा लेकर ग्राफ्टिंग (जख्मों पर त्वचा लगाना) नहीं की जा सकती थी। इसलिए आर्टिफिशियल स्किन सब्स्टिट्यूट (डर्मल) प्रोसेस का उपयोग किया गया। भारत में नवजात में डर्मल सब्स्टिट्यूट के उपयोग का यह पहला मामला है। इलाज के बाद बच्चा अब पूरी तरह से स्वस्थ है। वह करीब डेढ़ महीने का हो गया। अपने बेटे को जीवित पाकर उसके माता-पिता बड़े ही खुश हैं। सिलसिलेवार तरीके से जानिए पूरा मामला पीठ का 80% हिस्सा था इन्फेक्टेड शिप्रा के रहने वाले पंकज-सीमा जलवाया के नवजात बच्चे को जन्म के 6 दिन बाद बुखार आने लगा। वह दूध नहीं पीता था और उसके शरीर में सूजन भी आ गई। परिजन ने उसे सीहोर के एक अस्पताल में दिखाया। दो दिन उसे एनआईसीयू में भर्ती भी किया लेकिन आराम न मिलने पर इंदौर के बारोड हॉस्पिटल में भर्ती कराया। उसका सीना पूरी तरह से लाल हो गया था और पीठ का 80% हिस्सा इन्फेक्टेड होकर सूज गया था। बच्चे की पस निकली तो शरीर की हड्डियां दिखने लगीं
इंदौर में डॉक्टर ने हिस्ट्री पूछी तो माता-पिता ने कहा कि बच्चे को सर्दी हो गई थी इसलिए उसकी सिकाई की थी। डॉक्टरों का अनुमान था कि सिकाई से इतना इन्फेक्शन नहीं हो सकता। हाइजीन न रखने या फिर जिस एनआईसीयू में वह सीहोर में एडमिट था वहां उसे इन्फेक्शन हो सकता है। बच्चे की स्थिति ऐसी हो गई कि घाव से पस बाहर निकालने के बाद उसकी हड्डियां दिखने लगी। डॉक्टर्स ने उसे दवाओं से कंट्रोल करने की कोशिश की। इलाज के दौरान बच्चे की कल्चर कराई, जो चार दिनों में आई। इसमें जो इन्फेक्शन सामने आया वह साधारण नहीं होकर एबनॉर्मल इन्फेक्शन (सिनर्जिस्टिक बैक्टीरियल गैंग्रीन विद सेप्टीसीमिया) निकला। उसका ब्लड काउंट 29 हजार तक पहुंच गया था। रिपोर्ट आने के बाद डॉक्टरों को इलाज की दिशा मिली। डॉक्टरों ने परिजन की काउंसलिंग की
बच्चे की ऐसी स्थिति होने पर डॉक्टरों ने परिजन को एंटीबायोटिक बदलने और सर्जरी की आवश्यकता के बारे में समझाया। उन्होंने बताया कि जख्म की ड्रेसिंग ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे कवर करना पड़ेगा ताकि दोबारा इन्फेक्शन न हो। परिजनों की सहमति के बाद बच्चे की दो सर्जरी 18 और 25 जनवरी 2025 को की गईं, जो 4-4 घंटे तक चलीं। इसके बाद 40 हजार रु. की मेट्रिडर्म (आर्टिफिशियल स्किन) का उपयोग किया गया। यह पहली बार था जब 15 दिन के नवजात पर डर्मल सब्स्टिट्यूट का सफलतापूर्वक उपयोग हुआ। बच्चे को 22 दिनों तक बच्चे को एनआईसीयू में रखा गया और फिर पूरी तरह ठीक होने के बाद डिस्चार्ज कर दिया गया। डॉक्टर्स ने स्पेन के स्पेशलिस्ट से की बात बच्चे के शरीर के जिस हिस्से में जख्म था, वह बच्चे के यूरेनरी हिस्से के काफी पास था। ऐसे में गीले जख्म के पास पहुंचने से जोखिम था। इसके लिए डॉक्टरों ने स्पेन के नियोनेटल स्पेशलिस्ट सहित अन्य देशों के कुछ एक्सपर्ट डॉक्टरों से बात की। उन्होंने बताया कि इस तरह के मामलों में अगर इन्फेक्शन पेट की ओर बढ़ा तो बच्चे का बचना बहुत मुश्किल है। इसका काफी ध्यान रखा गया। यह पहला मामला था जिसमें इस प्रकार की स्थिति में नवजात पर डर्मल सब्स्टिट्यूट (कृत्रिम त्वचा) का उपयोग किया गया। डर्मल सब्स्टिट्यूट बनाने वाली कंपनी के अनुसार, यह पूर्णतः रिसर्च द्वारा प्रमाणित तथ्य है कि इससे पहले इस तरह की भीषण स्थिति में नवजात पर इसका उपयोग नहीं किया गया था। इस उपचार से जुड़े प्रमुख विशेषज्ञ डा. मार्कस ओवार (स्पेन) थे। खतरनाक इन्फेक्शन के कारण डॉ. हिमांशु केलकर (पीडियाट्रिशियन) के मुताबिक ऐसे मामलों में एनआईसीयू में रखने का पीरियड बढ़ जाता है। दरअसल, ऐसी स्थिति में बच्चे को घर नहीं ले जाया जा सकता क्योंकि घावों का भरना जरूरी है। ये परिवार काफी गरीब है। माता-पिता दोनों काम पर जाते हैं, ऐसे में बच्चे की देखभाल नहीं हो सकती थी। संभवतः कमजोर हाईजीन और सीहोर के एनआईसीयू में दो दिन तक रहने के दौरान उसे इन्फेक्शन लगा, जो अंदर ही अंदर बढ़ता गया और छह दिनों बाद सामने आया। डेढ़ माह में सवा चार किलो तक बढ़ा वजन
परिजन बच्चे को सामान्य स्थिति में पाकर खुश हैं। पिछले माह जब वह एडमिट हुआ था, तब उसका वजन पौने तीन किलो था। इलाज के दौरान उसका वजन सवा दो किलो हो गया था। फिर इलाज के बाद डेढ़ माह में उसका वजन सवा चार किलो हो गया। अब फॉलोअप में उसे विटामिन सी, डी, आयरन, और मल्टी विटामिन सप्लीमेंट दिए जा रहे हैं। बच्चा पूरी तरह से मां का दूध पी रहा है। इलाज में डेढ़ लाख रुपए खर्च आया
हॉस्पिटल के डायरेक्टर डॉ. संजय गोकुलदास ने बताया कि 15 दिन के बच्चे को सर्जरी के लिए एनेस्थीसिया देना जरूरी था, जिसमें एनेस्थेटिस्ट डॉ. चौहान ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।डॉ. हिमांशु केलकर (पीडियाट्रिशियन), डॉ. अश्विनी दास (प्लास्टिक और रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी), पीडियाट्रिक आईसीयू की इंटेंसिविस्ट डॉ. ब्लूम वर्मा और आईसीयू टीम ने तुरंत इलाज शुरू किया। इलाज में करीब डेढ़ लाख रु. का खर्च आया। परिवार के लिए बच्चे के इलाज का खर्च उठाना मुश्किल था, इसलिए अधिकांश जांचों में काफी कम चार्ज किया गया। डॉक्टरों ने भी अपनी फीस बहुत कम रखी। मुख्यमंत्री योजना से भी राशि मिली। साथ ही, हॉस्पिटल ने परिवार को हर संभव मदद की।


