बांकुडीह स्थित नीलकंठ मंदिर में आयोजित रामचरितमानस यज्ञ के अवसर पर पूरे क्षेत्र में उत्सव और भक्ति का अनुपम संगम देखने को मिल रहा है। मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति के बीच भजन–कीर्तन, आरती और मंत्रोच्चार से वातावरण पूरी तरह आध्यात्मिक रंग में रंगा हुआ है। शुक्रवार को कथा वाचिका देवी स्वाती जी द्वारा प्रस्तुत राम–सीता विवाह प्रसंग ने श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। प्रवचन के दौरान विवाह की पावन कथा को अत्यंत सरल और भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया गया, जिसमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम और माता सीता के आदर्श दांपत्य जीवन का वर्णन किया गया। कथा के हर प्रसंग पर श्रद्धालु ‘जय श्रीराम’ के उद्घोष के साथ भक्ति में लीन नजर आए। देवी स्वाती जी ने अपने प्रवचन में भगवान राम के उन उपदेशों को भी रेखांकित किया, जिन्हें अपनाकर मानव जीवन को सार्थक और कल्याणकारी बनाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि सत्य, धर्म, करुणा, त्याग और कर्तव्यपरायणता ही राम के जीवन के मूल सिद्धांत हैं। माता–पिता की आज्ञा का पालन, वचन की मर्यादा, भाई–भाई के प्रेम और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व जैसे गुण आज के समाज में भी उतने ही प्रासंगिक हैं। वक्ता ने कहा कि भगवान राम का जीवन हमें सिखाता है कि विपरीत परिस्थितियों में भी धैर्य और संयम बनाए रखना ही सच्ची विजय है। यज्ञ समिति के सदस्यों ने बताया कि प्रतिदिन कथा, हवन और आरती का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग ले रहे हैं। आयोजन के माध्यम से धार्मिक चेतना के साथ–साथ सामाजिक सद्भाव और नैतिक मूल्यों को मजबूत करने का संदेश दिया जा रहा है। स्वयंवर के आधार पर हुआ था माता सीता व राम का विवाह भगवान श्री राम और माता सीता का विवाह स्वयंवर के आधार पर हुआ था। मिथिला के राजा जनक ने माता सीता के स्वयंवर की शर्त रखी थी कि जो भी शिव धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, वही सीता का पति बनेगा। अनेक शक्तिशाली राजा धनुष को हिला तक न सके, लेकिन भगवान श्री राम ने उसे सहजता से उठाकर प्रत्यंचा चढ़ाई, जिससे धनुष टूट गया। इसी अद्भुत पराक्रम के कारण श्री राम और सीता का विवाह संपन्न हुआ, जो धर्म, मर्यादा और आदर्श दांपत्य का प्रतीक माना जाता है।


