सुप्रीम कोर्ट ने 13 नवंबर को तीन माह के भीतर झारखंड सरकार को सारंडा वन क्षेत्र में 314.68 वर्ग किलोमीटर को रिजर्व फॉरेस्ट घोषित करने का निर्देश दिया था। कहा था कि राज्य सरकार निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी कर सारंडा क्षेत्र को रिजर्व वन घोषित करे। कहा कि सारंडा एशिया के सबसे बड़े साल वनों में से एक है, इसलिए इसकी पारिस्थितिकी और जैव विविधता की रक्षा जरूरी है। उस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का अवैध खनन या अतिक्रमण न हो और पहले से चल रही गतिविधियों की समीक्षा होनी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा था प्रक्रिया के दौरान आदिवासी और अन्य पारंपरिक वन वासियों के वैध अधिकारों का ध्यान रखा जाए। अदालत ने अपने आदेश में कहा था कि राज्य सरकार ने पहले स्वीकार किया था कि सारंडा पशु अभयारण्य के पूरे क्षेत्र को 1968 में पहली बार अधिसूचित किया गया था। यह कोई सक्रिय खनन क्षेत्र नहीं था और उसे संरक्षण की आवश्यकता थी। 12 फरवरी को तीन माह बीत जाने के बाद भी वन एवं पर्यावरण विभाग ने इस संबंध में कोई आदेश जारी नहीं किया है। सूत्रों का कहना है विभाग में लगातार इस मामले को लेकर फाइल ऊपर नीचे हो रही है। आदेश का अनुपालन न होना दुर्भाग्यपूर्ण : सरयू जदयू विधायक व पूर्व मंत्री सरयू राय ने कहा है कि झारखंड सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन न करना दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा है कि राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के तहत सारंडा क्षेत्र को अभयारण्य और रिजर्व घोषित करने में देरी कर रही है, जबकि इस दिशा में पहले ही कदम उठाए जाने चाहिए थे। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जिस क्षेत्र (31,468 हेक्टेयर) को अभयारण्य घोषित करने का आदेश था, वह पिछले कई वर्षों से इसकी मांग कर रहे हैं।


