भारतीय सनातन संस्कृति का अत्यंत पावन और गूढ़ पर्व है महाशिवरात्रि

भास्कर न्यूज | झालावाड़ अंतर्राष्ट्रीय वैदिक ज्योतिषी हेमंत कासट झालावाड़ ने बताया कि महाशिवरात्रि भारतीय सनातन संस्कृति का एक अत्यंत पावन और गूढ़ पर्व है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान न होकर आत्मबोध, तप, संयम और शिव-तत्त्व के साक्षात्कार का महापर्व है। वर्ष 2026 में 15 फ़रवरी को मनाई जाने वाली महाशिवरात्रि विशेष आध्यात्मिक एवं ज्योतिषीय संयोगों के कारण और भी महत्त्वपूर्ण मानी जाती रही है। पौराणिक महत्त्व: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार महाशिवरात्रि वह दिव्य रात्रि है, जब भगवान शिव का पार्वती जी से विवाह संपन्न हुआ। इसी रात्रि को शिव ने हलाहल विष का पान कर सृष्टि की रक्षा की। शिवलिंग के रूप में निराकार से साकार तत्त्व का प्रकटीकरण हुआ। पुराणों में वर्णित है कि इस रात्रि को शिव की उपासना करने से मनुष्य के पूर्वजन्मों के पाप, अहंकार और अज्ञान का क्षय होता है तथा जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। आध्यात्मिक दृष्टिकोण : महाशिवरात्रि का वास्तविक अर्थ है “अज्ञान के अंधकार से चेतना के प्रकाश की ओर जाना”। यह रात्रि आत्मसंयम, मौन, ध्यान और जागरण के लिए सर्वोत्तम मानी गई है। योग, मंत्र एवं तंत्र शास्त्रों के अनुसार, इस रात्रि को ब्रह्मांडीय ऊर्जा स्वाभाविक रूप से ऊपर की ओर प्रवाहित होती है, जिससे कुंडलिनी जागरण में सहायता मिलती है। ध्यान शीघ्र फलदायी होता है। मन, प्राण और चित्त पर नियंत्रण सरल हो जाता है। इसी कारण साधक, योगी और तपस्वी इस रात्रि को जागरण कर शिव-ध्यान में लीन रहते हैं। वैदिक ज्योतिषीय महत्व: वर्ष 2026 की महाशिवरात्रि कृष्ण पक्ष चतुर्दशी तिथि को पड़ रही है, जो शिव-पूजन के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है। ज्योतिषीय दृष्टि से: यह तिथि शनि, चंद्र और राहु से संबंधित दोषों की शांति के लिए वि शेष फलदायी है। कालसर्प दोष, साढ़ेसाती, ढैय्या एवं मानसिक तनाव से पीड़ित जातकों के लिए यह रात्रि अत्यंत प्रभावशाली मानी गई है। इस दिन किया गया शिव-पूजन कर्म जो हमें यह शिक्षा देता है कि संपूर्ण परिवार को एक साथ रहना है अपनाने से बाधाओं को कम करने तथा भाग्य को अनुकूल करने में सहायक होता है। रुद्राभिषेक: कच्चे दूध, जल, बेलपत्र, शहद और गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करें। जिस प्रकार पंच तत्वों के एक साथ रहने से सृष्टि कल्याण कारी होती है ठीक उसकी प्रकार परिजनों के एक साथ रहने से परिवार खुशहाल रहता है और इससे मानसिक शांति और रोगों से मुक्ति मिलती है। मंत्र जाप: “ॐ नमः शिवाय” का कम से कम 108 या 1008 बार जाप करें। यह मंत्र आत्मिक शुद्धि और ऊर्जा के साथ शांति और संतुलन प्रदान करता है इस साधन को नित्य प्रयोग में लाना है। व्रत एवं जागरण : यथाशक्ति व्रत रखकर रात्रि जागरण करें। यह इंद्रियों पर नियंत्रण और आत्मबल बढ़ाता है। क्योंकि जिस भूख में प्रमाद उत्पन्न नहीं होता वैसे ही हमें जीवन में अपनाना है दान एवं सेवा: अन्न, वस्त्र, तिल, काले वस्त्र या जरूरतमंदों को भोजन दान करें। इससे शनि और राहु संबंधी दोष शांत होते हैं। मौन और ध्यान: कुछ समय मौन रहकर शिव-ध्यान करने से चंद्रमा मन आत्मा सूर्य में स्थिर होता है। यह उपाय विशेष रूप से विद्यार्थियों, साधकों और मानसिक तनाव से ग्रस्त लोगों के लिए लाभकारी है। निष्कर्ष : महाशिवरात्रि केवल एक पर्व नहीं, बल्कि जीवन-शैली का संदेश है। भगवान शिव का आदर्श हमें सिखाता है सादगी, संयम, करुणा और कर्तव्यपरायणता। जो व्यक्ति शिव के बताए चरित्र को जीवन में उतार लेता है, उसके लिए महाशिवरात्रि केवल एक दिन नहीं, बल्कि प्रतिदिन का साधना-पर्व बन जाती है।

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