होली के आठ दिन पहले होलाष्टक की शुरुआत फाल्गुन शुक्ल सप्तमी युक्त अष्टमी 24 फरवरी से शुरू होगी। ये होलाष्टक होलिका दहन के साथ पूरे होंगे। इस बार अष्टमी तिथि का क्षय हुआ है। मंगलवार को सप्तमी तिथि सुबह 7:06 तक रहेगी। मान्यता के अनुसार अष्टमी से पूर्णिमा तक नवग्रह भी उग्र रूप लिए रहते हैं। यही वजह है कि इस अवधि में किए जाने वाले शुभ कार्यों में अमंगल होने की आशंका बनी रहती है। ग्रहों की प्रतिकूलता के कारण होलाष्टक में आठ दिनों तक सभी प्रकार के मांगलिक और शुभ कार्य वर्जित रहते हैं। धार्मिक व तांत्रिक महत्व ज्योतिषाचार्य ने बताया कि धार्मिक दृष्टि से यह समय भक्ति, तपस्या और संयम का माना गया है। इस दौरान देवी-देवताओं की साधना, जप और व्रत करने से विशेष लाभ मिलता है। तांत्रिक दृष्टि से यह समय सिद्धियों और साधनाओं के लिए उपयुक्त माना जाता है, लेकिन शुभ कार्यों के लिए नहीं। किस दिन कौनसा ग्रह उग्र अष्टमी को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि,एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चतुर्दशी को मंगल और पूर्णिमा को राहू उग्र रहते हैं। इस दौरान नकारात्मकता की अधिकता रहती है। इसका असर व्यक्ति के सोचने-समझने की क्षमता पर भी पड़ता है। डॉ. पंकज विश्नोई, आयुर्वेद चिकित्सा अधिकारी, बाड़मेर होलाष्टक की परंपरा के पीछे सिर्फ धार्मिक कारण ही नहीं है होलाष्टक का विज्ञान प्रकृति और मौसम के बदलाव से जुड़ा हुआ है। इन दिनों वातावरण में बैक्टीरिया वायरस अधिक सक्रिय होते हैं। सर्दी से गर्मी की ओर जाते इस मौसम में शरीर पर सूर्य की पराबैंगनी किरणें विपरीत प्रभाव डालती हैं। होलाष्टक शीत ऋतु से ग्रीष्म ऋतु के बीच का समय है। आयुर्वेद के अनुसार, इस दौरान शरीर में कफ दोष असंतुलित हो सकता है, जिससे सर्दी, खांसी और सुस्ती हो सकती है। यह समय स्वास्थ्य पर ध्यान देने का है। होलाष्टक के दौरान तामसिक भोजन से बचकर हल्का, सुपाच्य और सात्विक आहार लेने की सलाह दी जाती है, जो शरीर के विषैले पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है।


