प्रदेश की सत्ता में काबिज होने के दो साल बाद भी भाजपा सरकार राज्यभर के 759 निगम, पालिका और नगर पंचायतों में एल्डरमैन की नियुक्ति नहीं कर पाई है। कांग्रेस के कार्यकाल में नियुक्ति एल्डरमैन के बर्खास्त होने के बाद से सभी निकायों में उनके पद खाली हैं। चर्चा यह है कि ज्यादातर नगर निगमों में भाजपा पार्षद बहुमत में जीतकर आए हैं। इसलिए निकायों में मनोनीत जनप्रतिनिधियों की जरूरत ही महसूस नहीं की जा रही है। दूसरी बड़ी वजह फंड की है। सरकार को एल्डरमैन के वेतन (मानदेय) पर ही हर साल करीब 43 लाख रुपए और विकास कामों के लिए फंड के रूप में तकरीबन 23 करोड़ रुपए का बोझ बढ़ जाएगा। संबंधित वार्डों के लिए सरकार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को फंड दे ही रही है। ऐसी स्थिति में दोहरा फंड देने से अनावश्यक बोझ बढ़ जाएगा। बताया जा रहा है कि इन वजहों से सरकार एल्डरमैन की नियुक्ति में रुचि नहीं ले रही है। 2018 में सरकार बनाने के महज नौ-दस महीने में ही कांग्रेस सरकार ने निकायों में एल्डरमैनों की नियुक्ति शुरू कर दी थी। 2019 से 2020 के बीच हर निकाय में एल्डरमैन नियुक्त कर लिए गए थे। इसके बाद दिसंबर 2023 में प्रदेश में भाजपा सरकार काबिज हुई। 2024, 2025 बीतने के बाद अब 2026 शुरू हो गया है। यह तीसरा साल है। अब तक एल्डरमैन की नियुक्ति को लेकर सरकार में कोई सुगबुगाहट नहीं है। इसलिए नियुक्त किए जाते हैं एल्डरमैन
नगर निगम एक्ट 1956 की धारा 9 में एल्डरमैन की नियुक्ति को लेकर प्रावधान है। कैबिनेट में नियुक्ति के निर्णय के बाद नगरीय प्रशासन विभाग आदेश जारी करता है। इसका उद्देश्य अनुभवी लोगों को नगरीय निकायों के संचालन में मदद के लिए मनोनीत करना है। आमतौर पर नामित एल्डरमैन किसी विशेष क्षेत्र के दक्ष और विशेषज्ञ होते हैं। जैसे रोड इंजीनियरिंग, स्वच्छता, वित्त और प्लानिंग इत्यादि। ये नियुक्ति के वैधानिक कारण है। हालांकि, राजनीतिक रूप से देखा जाए तो इसके पीछे राजनीतिक पार्टियों का अपने कार्यकर्ताओं को लाभान्वित करना है। पालिका-नगर पंचायतों में बीजेपी का पलड़ा भारी
निर्वाचित जनप्रतिनिधियों का कहना है कि एल्डरमैन को लेकर जरूरत ही महसूस नहीं की जा रही है। रायपुर नगर निगम के 70 में से 60 वार्ड में भाजपा पार्षद चुने गए हैं। एक निर्दलय भी भाजपा में शामिल हो गए हैं। भाजपा पार्षदों में से अधिकांश पहली बार के निर्वाचित हैं। भाजपा के सभी कार्यकर्ताओं को निगम में मौका मिला है। इसलिए एल्डरमैन की यहां जरूरत ही नहीं है। इसी तरह बिलासपुर के 70 में से 49 वार्डों में भाजपा पार्षद निर्वाचित हुए हैं। यहां कांग्रेस के महज 18 और तीन निर्दलीय पार्षद हैं। यहां भाजपा का सक्सेस रेट 70 फीसदी है। यही स्थिति सभी निगमों, पालिकाओं और पंचायतों में है।


