भास्कर न्यूज| अमलीपदर कोचंगा पंचायत के इचरादी गांव के 52 परिवार जंगल इचरादी से करीब 4 किमी दूर जंगल में झोपडि़यों में रह रहे हैं। उन्हें जंगल में अतिक्रमण बताकर साल 2023 में बेदखल कर दिया गया था। तब से वे ऐसे ही रहे हैं। इनमें कई लोग ओडिशा के रहने वाले हैं, जो यहां आकर सालों पहले बस गए थे। लेकिन वे अब वहां भी नहीं जा पा रहे हैं, क्योंकि वोटर आईडी, राशन कार्ड आदि कई कागज उनके यहीं के बने हुए हैं। उन्होंने शासन से मदद की गुहार लगाई है। गांव के अमोल सिंह और फुलचंद मरकाम ने बताया कि करीब 20-25 साल पहले, ये 50-60 परिवार ओडिशा से आकर छत्तीसगढ़ के जंगलों में बसे थे। इन्होंने जंगल की जमीन को रहने लायक बनाया, खेती-बाड़ी शुरू की और धीरे-धीरे एक पूरा गांव बसा लिया। सरकारी योजनाओं के तहत इन्हें तमाम बुनियादी सुविधाएं भी मिलीं। लेकिन दो साल पहले, वन विभाग ने पूरे गांव को अवैध अतिक्रमण मानते हुए उजाड़ दिया। वन विभाग का दावा है कि इचरादी गांव 2012-13 के बाद बसा था, जबकि वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत केवल 2005 से पहले बसे गांवों को ही पट्टा दिया जा सकता है। इसी आधार पर प्रशासन ने गांव को अवैध घोषित कर वहां के निवासियों को बेदखल कर दिया। गांव को भी उजाड़ दिया। ओडिशा सरकार भी उन्हें अपना नागरिक मनाने से इंकार कर रही है। इचरादी के लोगों के बच्चों का भविष्य संकट में है। गांव से बेघर किए गए ये परिवार अब छत्तीसगढ़-ओडिशा सीमा पर झुग्गी-झोपड़ियों में रहने को मजबूर हैं। बिजली नहीं है, पानी के लिए नदी-तालाबों पर निर्भर रहना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है। रात में अंधेरे और जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है। वन विभाग के उप निदेशक वरुण जैन का कहना है कि हमने इसरो के सैटेलाइट डेटा के आधार पर पता किया कि यह गांव 2012-13 में बसा था। कानून के मुताबिक, 2005 से पहले बसे गांवों को नुकसान नहीं पहुंचाया जाता, लेकिन बाद में बसने वालों को हटाया जाएगा। हमारे पास इनके पुनर्वास की कोई योजना नहीं है। इधर ग्रामीण कह रहे हैं कि अगर हम अवैध थे तो सरकार ने हमें आधार कार्ड, राशन कार्ड, वोटर आईडी, आवास योजना का लाभ क्यों दिया अगर हमें पहले ही हटा दिया जाता, तो हम इतने साल यहां नहीं रहते और आज शरणार्थी बनने को मजबूर नहीं होते।


