उदयपुर में फैक्ट्रियों के गंदे केमिकल और शहर की गंदगी ने आयड़ नदी को एक जहरीले नाले में बदल दिया है। अब इस प्रदूषण के खिलाफ उदयपुर के झील प्रेमियों और ग्रामीणों ने आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। आयड़ नदी को बचाने के लिए 25 फरवरी को एक ऐतिहासिक आंदोलन का आगाज होने जा रहा है। पिछोला किनारे बनी आंदोलन की रणनीति
इस बड़े आंदोलन की रूपरेखा तैयार करने के लिए पिछोला झील के किनारे भीमाशंकर महादेव मंदिर परिसर में एक अहम बैठक हुई। मेवाड़ किसान संघर्ष समिति और झील प्रेमियों ने इस मीटिंग में हिस्सा लिया। बैठक की अध्यक्षता कर रहे झील प्रेमी डॉ. अनिल मेहता ने साफ कहा कि अब चुप बैठने का समय निकल चुका है। नदी का प्रदूषण अब लोगों की जान पर बन आया है। 12 गांवों के ढोल और साधु-संतों का शंखनाद
आंदोलन को लेकर इस बार तैयारी बिल्कुल अलग और अनूठी है। पूर्व उपसरपंच मदनलाल डांगी ने बताया कि 25 फरवरी को आयड़ नदी के किनारे बसे 12 गांवों से एक-एक ढोल लाया जाएगा। जब ये 12 ढोल एक साथ कानपुर खेड़ा पुलिया पर गूंजेंगे, तो सोए हुए प्रशासन को जगाने का काम करेंगे। इस दौरान साधु-संत भी वहां मौजूद रहेंगे जो शंखनाद कर इस मुहिम की शुरुआत करेंगे। इसका मकसद सरकार और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का ध्यान इस गंभीर समस्या की ओर खींचना है। फैक्ट्रियों को हटाने और एसटीपी की मांग
बैठक में मौजूद विशेषज्ञों और जानकारों ने नदी की बर्बादी के कारणों पर खुलकर बात की। डॉ. अनिल मेहता ने मांग रखी कि कलड़वास रीको और मादड़ी इंडस्ट्रियल एरिया में चल रही केमिकल फैक्ट्रियों को सरकार तुरंत यहां से कहीं और शिफ्ट करे। वहीं, नंदकिशोर शर्मा ने कहा कि शहर के हर होटल और रिसोर्ट में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) लगाना अनिवार्य होना चाहिए, ताकि गंदा पानी सीधे नदी में न मिले। तेज शंकर पालीवाल ने दुख जताते हुए कहा कि जिस नदी की धारा कभी निर्मल थी, उसे आज सरकारी अनदेखी ने नाला बना दिया है। बीमारियों का घर बन रही है नदी
मेवाड़ किसान संघर्ष समिति के संयोजक विष्णु पटेल और मदनलाल डांगी ने बताया कि प्रदूषण का असर अब जमीन के अंदर के पानी तक पहुंच गया है। नदी किनारे बसे एक दर्जन गांवों में लोग बीमार हो रहे हैं। हालत यह है कि अब इस नदी का पानी पशुओं के पीने लायक भी नहीं बचा है। विष्णु पटेल ने अपील की है कि यह किसी राजनीति का मंच नहीं है, बल्कि यह हमारे स्वास्थ्य और आने वाली पीढ़ी से जुड़ा मामला है। इसलिए 25 फरवरी को किसान, मजदूर, युवा और शहर के आम लोग बड़ी संख्या में जुटकर इस जनआंदोलन को सफल बनाएं।


