वंदे मातरम पर जमीअत ने कहा- जबरदस्ती ठीक नहीं:मुल्क से मोहब्बत ईमान, लेकिन इबादत सिर्फ अल्लाह की; हिंदी में बने नया राष्ट्रगीत

जमीअत उलेमा मध्यप्रदेश के अध्यक्ष हाजी मोहम्मद हारून ने वंदे मातरम गीत को लेकर आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम गीत पर शुरू से ही आपत्तियां हैं। मुसलमानों की तरफ से हमेशा इस पर ऐतराज किया गया है। इसके छंद पर मुल्क से मोहब्बत करना हमारा ईमान है। हम मुल्क से मोहब्बत करते हैं, प्यार करते हैं, प्रेम करते हैं। हम अपने मां-बाप से मोहब्बत करते हैं, प्यार करते हैं, प्रेम करते हैं। क्योंकि प्रेम करने में और पूजने में जमीन आसमान का फर्क है। हम चाहते हैं कि ये जो पूजनीय लफ्ज है, हम अल्लाह, एक ईश्वर, एक गॉड, एक अल्लाह के अलावा किसी को भी इबादत नहीं करते और यह पूरी दुनिया अच्छी तरह जानती है कि मजहब इस्लाम का क्या मौकफ है। मुसलमानों का क्या मौकफ है और भारत के संविधान ने हमको क्या आजादी दी हुई है। ये भारत सरकार और प्रदेश सरकार भी अच्छी तरह जानती है। जबरदस्ती करने की कोशिश की जाती है। अब भी कानून तो नहीं बनाया है, बस ऑर्डर निकालते रहते हैं। गीत का मतलब बड़े-बड़े लोग नहीं समझते उन्होंने कहा, “सूरते हाल ये है कि बड़े-बड़े लोग वंदे मातरम के मतलब को नहीं समझते, जन गण मन के मतलब को नहीं समझते। यहां के एक बड़े जिम्मेदार से पत्रकार ने पूछा कि वंदे मातरम सुनाओ तो वो नहीं सुना पाए। तो मेरा यहां में मुतालबा है कि भारत सरकार को गौर करना चाहिए कि ये बंगाली भाषा के गीत हैं और भारत में हिंदी भाषा पूरे भारत में बोली जाती है। ज्यादातर लोग हिंदी भाषा बोलते हैं। तो एक बेहतरीन गीत का नवनिर्माण भारत के लिए करना चाहिए, ताकि सब लोगों को कुबूल हो और हिंदी में हो। एक बड़ी उच्च स्तरीय कमेटी बनाना चाहिए। बड़े-बड़े विद्वानों को, शायरों को, कवियों को शामिल करके एक अच्छा गीत लिखा जाना चाहिए। सारे जहां से अच्छा की तरह सर्वमान्य गीत बने हाजी मोहम्मद हारून ने कहा, जैसे अल्लामा इकबाल ने गीत लिखा था, सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा, ये गीत भी आज भारत में गाया जाता है, बजाया जाता है, फौज के अंदर गाया जाता है और भारत के हर कोने पे ये गीत बजाया जाता है। या तो इस गीत को भारत का गीत मान लिया जाए या कोई और गीत ऐसा बनाया जाए, क्योंकि यह जो दोनों गीत है, यह हमारी समझ में नहीं आते। बहुत सारे हिंदू भाइयों की भी समझ में नहीं आते। तो मैं तो यहां ये मुतालबा करूंगा कि कोई अभी भी पढ़े-लिखे लोगों की कमी नहीं है। जब कंट्रोवर्सी है इस गीत पर, इस गीत पे बहुत सारे लोगों का ऐतराज है, भारत के संविधान ने जो हमें आजादी दी है या उसके भी खिलाफ है, तो हमारा मुतालबा है कि जबरदस्ती किसी पे किया जाए। जो पढ़ना चाहते हैं पढ़े और जो नहीं पढ़ना चाहते हैं ना पढ़े। एक अच्छे गीत के नवनिर्माण होना चाहिए। हिंदी में नया गीत बने, सबके दिलों को मजा दे उन्होंने कहा, “हिंदी भाषा में एक गीत बनना चाहिए भारत के लिए। उर्दू में तो है सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तान हमारा। हिंदी भाषा में भी एक कर लीजिए। दो गीत बना लीजिए। ये गीत जो है, लोगों को समझ के सच्ची बात है, नहीं आता। हिंदू भाइयों को बुला लीजिए, वो उसका मतलब नहीं बता पाएंगे। गाते हैं लेकिन बता नहीं पाते। अच्छा गीत बनाइए, सबके दिलों को मजा दे। भारत की फौज को, भारत के लोगों को, पुलिस को, सबको अच्छा लगे। ऐसा गीत बना दीजिए। सारा देश कुबूल करेगा। ये मैं मांग करता हूं।” न पढ़ने वालों को देशद्रोही कहना गलत उन्होंने कहा, हां बिल्कुल ये गलत बात है। अगर कहीं इससे सौहार्द खराब होता है, मान लो कोई मजलिस है और कोई गीत पढ़ रहे हैं ये वाला और कुछ लोग नहीं पढ़ रहे हैं। अब वो जो नहीं पढ़ रहे हैं, उसकी वजह पढ़ने वालों को समझ में नहीं आती भाई क्यों नहीं पढ़ रहे हैं। वो सीधा एकदम कह देते हैं देशद्रोही है। देशद्रोही नहीं है। कोई देशद्रोही नहीं। हम देश से प्रेम करते हैं, अपने मुल्क से मोहब्बत करते हैं, अपने पहाड़ों से, अपनी नदियों से। अल्लामा इकबाल ने कहा हिमालिया के बारे में, गोदी में खेलती है जिसकी हजारों नदियां। ये सारे गीत हमारे ‘सारे जहां से अच्छा’ में मौजूद हैं। तो ऐसी चीज नहीं होना चाहिए। जब सारे जहां से अच्छा पढ़ा जाता है, सारे धर्म के लोग इसको पढ़ते हैं और मजा लेते हैं। फौज में भी पढ़ा जाता है। ये मेरा मांग है भारत सरकार से, हमारी प्रदेश सरकार से कि हिंदी में अच्छा गीत बनाए और जिससे सौहार्द बिगड़े ऐसी चीज को छोड़ देना चाहिए। कानून नहीं है तो जबरदस्ती ठीक नहीं
उन्होंने कहा, नहीं कानून तो ना बनेगा, ना बनाएगी। वो तो जबरदस्ती की बातें हैं। हम चाहते हैं कि ये सब ना हो, अच्छी चीजें हो। जैसे और चीजें भी होती है। खेल है तो खेल सारे होना चाहिए। सूर्य नमस्कार पे बहस चलती है। सूर्य नमस्कार की जो मुद्राएं, उसकी आसन, उस पे जो ऐतराज नहीं है। लेकिन उसमें जो पूजा-पाठ की बात होती है, उस पे ऐतराज होता है। वरना तो एक्सरसाइज में तो एक्सरसाइज कोई और भी हो सकती है। क्रिकेट भी है, और भी चीजें हैं, सबका बढ़ावा होना चाहिए। राष्ट्रगीत से जुड़े नए नियम न मानने पर क्या होगा? ‘वंदे मातरम’ से मुसलमानों को क्या आपत्ति, इसे एंटी मुस्लिम क्यों कहा जाता है?

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