हैदराबाद में रहने वाली जी. कल्याणी राव की ख्वाहिश थी कि उनकी बेटी की शादी त्रियुगीनारायण में हो। बस, वे यह ख्वाहिश पूरी करने में जुट गईं। इंफोसिस, पुणे में काम कर रहीं अनुश्रेया और सूरत के ज्वेलरी का बिजनेस करने वाले डेनिश गोधानी ने त्रियुगीनारायण में सात फेरे लिए। यहां शादी करने वाला यह इकलौता जोड़ा नहीं है, बल्कि हर रोज यहां ऐसी 25 से 30 शादियां हो रही हैं। क्यों..? इस सवाल का जवाब दिलचस्प है। हरिद्वार से लगभग 250 किलोमीटर, इसमें भी लगभग 80 किलोमीटर का रास्ता बेहद कठिन और रूह कंपा देने वाला है। तमाम बाधाएं पार कर देश के तकरीबन सभी राज्यों से शादी करने वाले जोड़े और उनके रिश्तेदार त्रियुगीनारायण पहुंच रहे हैं। दूसरे देशों में रहने वाले जोड़े भी आते हैं। इस जगह से केदारनाथ की दूरी महज 25 किमी बचती है। लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए रास्ते के नाम पर सिर्फ पगडंडी है। जिसकी जानकारी यहां के स्थानीय लोगों को ही है। त्रियुगीनारायण… नाम से ही स्पष्ट है तीन युगों के भगवान। पहाड़ की चोटी पर बसे गांव का नाम भगवान के नाम पर ही है। गांव के बीच में केदारनाथ की तरह ही दिखने वाला एक छोटा सा मंदिर। भीतरी दरो-दीवार दरकी हुई। गर्भगृह के बाहर अखंड धुनी जल रही है। बताया जाता है कि यह दशकों से नहीं बुझी। नए जोड़े इस पवित्र अग्नि को साक्षी मानते हैं। मंदिर परिसर में तीन वेदियां हैं, जिन्हें धर्मशिला के नाम से जाना जाता है। शादियां इन्हीं में होती हैं। मंदिर में विवाह करवाना हो तो महीनों पहले से बुकिंग होती है। देवशयनी के बाद चार महीनों को छोड़कर पूरे सालभर यहां शादियों का उत्सव चलता रहता है। मान्यता है कि, भगवान शिव और माता पार्वती का दिव्य विवाह यहीं हुआ था। स्वयं विष्णु ने विवाह संस्कार पूरे करवाए। गर्भगृह के सामने जलता अक्षय अग्निकुंड इस विवाह का प्रतीक है। लोग मानते हैं कि यह अग्नि त्रेतायुग से अब तक लगातार प्रज्वलित है। देखिए तस्वीरें… सीजन में रोज 20 से 25 शादियां पुजारी नागेंद्र प्रसाद बताते हैं कि, इसी स्थान पर त्रेतायुग में पर्वतों के राजा हिमाचल ने अपनी बेटी पार्वती का शिवजी को कन्यादान किया था। यह विवाह राजा हिमाचल के कुलगुरु ने करवाया था। यहां मंदिर परिसर में चार कुंड हैं। पहले दो कुंड स्नान के हैं। तीसरा चरणामृत का और चौथा पितृ पूजन के लिए है। तीन वेदियां हैं, जिनमें शादियां होती हैं। सीजन में यहां एक दिन में 20 से 25 शादियां हो रही हैं। पूरे हिंदुस्तान से जोड़े आते हैं। एक शादी पर कुल 30 हजार रुपए खर्च आता है। वर और वधु पक्ष 15-15 हजार रुपए देते हैं। खरमास और बर्फबारी के दिनों को छोड़ दें तो पूरे सालभर मंदिर और आसपास मेला सा लगा रहा रहता है। दशकों से गांव की अर्थव्यवस्था का आधार है मंदिर उत्तरी त्रिकोण में समुद्रतल से 1947 मीटर की ऊंचाई पर बसे त्रियुगीनारायण में करीब 200 घर हैं। अधिकतर तीर्थ पुरोहितों के परिवारों के हैं। शादी-ब्याह करवाने के लिए इन पुरोहितों के समूहों का रोटेशन तय है। यही इनकी आजीविका का आधार है। तीर्थ पुरोहित समिति सारी व्यवस्था देखती है। पुरोहित समिति के सच्चिदानंद बताते हैं कि, रजिस्ट्रेशन के लिए आधार से लेकर तमाम औपचारिकताएं और वर-वधु के माता-पिता की मंजूरी जरूरी होती है। गांव के कई घरों में टेंट लगाए जाते हैं और इन्हें वर-वधु पक्ष को किराए पर दे दिया जाता है। अधिकतर लोग 15 किमी पहले सीतापुर में होटल भी बुक करवा लेते हैं। त्रियुगीनारायण से लौटकर हर्ष पाण्डेय की रिपोर्ट


