कोटा शहर के कंसुआ इलाके में 12वीं शताब्दी के ऐतिहासिक कर्णेश्वर महादेव मंदिर परिसर में एक पुराने कमरे की छत अचानक भरभराकर गिर गई। शुक्र है कि उस वक्त वहां कोई नहीं था, वरना बड़ा हादसा हो सकता था। यह जगह उस कुंड के ठीक बगल में है, जहां रोजाना बच्चे, बुजुर्ग और महिलाएं स्नान करने आते हैं और दीवार के पास बैठते हैं। कल ही महाशिवरात्रि पर यहां हजारों भक्तों की भीड़ उमड़ी थी। कर्णेश्वर मानव सेवा संस्थान के अध्यक्ष मुकेश सोनी ने बताया कि मंदिर परिसर में तीन प्राचीन कमरे हैं, जिनमें से एक लंबे समय से जर्जर हालत में था। उन्होंने कई बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को शिकायत की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। सोनी ने कहा, “दो महीने पहले ही छत की अंदरूनी पट्टियां टूट चुकी थीं। हमने विभाग को सूचना दी, सर्वे हुआ और जल्द ही मरम्मत कार्य शुरू होने की बात कही जा रही थी, लेकिन उससे पहले ही कमरा ढह गया। पुरातत्व विभाग के कंजर्वेशन असिस्टेंट दयानंद गुप्ता ने बताया कि कमरा काफी पुराना था और अचानक छत गिर गई। उन्होंने कहा कि मंदिर परिसर में बजट अनुसार निर्माण कार्य जारी है और टूटे हुए कमरे का पुनर्निर्माण जल्द कराया जाएगा। हमारे पास बजट का 2 से 5 लाख रुपए ही आता है। स्थानीय लोगों में घटना को लेकर नाराजगी देखने को मिली। उनका कहना है कि मंदिर परिसर सेंट्रल गवर्नमेंट के अधीन है और बजट भी स्वीकृत है, बावजूद इसके जर्जर संरचनाओं की अनदेखी की जा रही है। लोगों ने बताया कि मंदिर परिसर में मौजूद पुरातत्व विभाग के अधिकारियों द्वारा ऑफिस का तो काम करवाया जा रहा है लेकिन मंदिर के पुराने कमरों की ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा हैं। परिसर में बने बड़े कुंड के चारों ओर लोहे की रेलिंग लगाने की मांग वर्षों से लंबित है। बरसात के दौरान अधिक पानी आने पर यहां मगरमच्छों के आने की घटनाएं भी सामने आती रही हैं। स्थानीय नागरिकों ने प्रशासन से मंदिर परिसर की सुरक्षा और जर्जर ढांचों के शीघ्र जीर्णोद्धार की मांग की। इस पूरे मामले पर जयपुर पुरातत्व विभाग के अधिकारी विनय गुप्ता से बात की इस पूरे घटनाक्रम के बारे में बताया तो जिम्मेदार अधिकारी ने कहा कि मैं इस मामले में कुछ भी बोलने के लिए ऑथराइज्ड नहीं हूं। हमारे दिल्ली में बैठे अधिकारियों से बात करें।


