मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय (सुविवि) में शिक्षकों की पदोन्नति वर्षों से लंबित है। यह मुद्दा अब सीधे तौर पर शोध और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता पर असर डाल रहा है। एसोसिएट प्रोफेसर और प्रोफेसर पदों पर समय पर इंटरव्यू नहीं होने से न केवल करीब 50 शिक्षकों की कॅरिअर प्रगति रुकी हुई है, बल्कि सबसे बड़ा नुकसान पीएचडी शोधार्थियों को हुआ है। समय पर पदोन्नति प्रक्रिया पूरी कर ली जाती तो प्रत्येक पदोन्नत शिक्षक को दो अतिरिक्त पीएचडी सीटें मिलतीं और विश्वविद्यालय में लगभग 100 नई शोध सीटों की वृद्धि संभव थी। इसके साथ ही करीब 50 टीएसपी के शोधार्थियों के लिए सुपरन्यूमेरी सीटें भी बढ़ सकती थीं, जिससे दक्षिणी राजस्थान के जनजातीय क्षेत्रों के विद्यार्थियों को सीधा लाभ मिलता। यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) रेगुलेशन 2018 के क्लॉज 6.3 में स्पष्ट प्रावधान है कि शिक्षक अपनी पात्रता तिथि से तीन माह पूर्व आवेदन कर सकते हैं और आवेदन के छह माह के भीतर पदोन्नति प्रक्रिया पूरी करना विश्वविद्यालय के लिए अनिवार्य है। इसके बावजूद शिक्षकों द्वारा आवेदन करने के बाद भी पदोन्नति के मामले लंबित चल रहे हैं। देरी का असर विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय रैंकिंग, शोध प्रकाशन, पीएचडी गाइडेंस और अकादमिक नेतृत्व पर भी पड़ रहा है। समय पर प्रमोशन न केवल शिक्षकों के आर्थिक और पेशेवर हितों से जुड़ा है, बल्कि संस्थान की साख और छात्रों के भविष्य से भी सीधा संबंध रखता है। यूजीसी के नियमानुसार एक असिस्टेंट प्रोफेसर के लिए अधिकतम सीमा 4 पीएचडी शोधार्थियों, एसोसिएट प्रोफेसर अधिकतम 6 पीएचडी शोधार्थियों और प्रोफेसर के लिए अधिकतम सीमा 8 पीएचडी शोधार्थियों की है। यूजीसी नियम और प्रमोशन के शिक्षकों-विद्यार्थियों को फायदे यूजीसी की कैरियर एडवांसमेंट स्कीम (सीएएस) के तहत सहायक आचार्य से सह आचार्य और प्रोफेसर तक पदोन्नति का स्पष्ट प्रावधान है। क्लॉज 6.3 के अनुसार शिक्षक पात्रता तिथि से तीन माह पूर्व आवेदन कर सकता है और छह माह में प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है। प्रत्येक पदोन्नत शिक्षक को अतिरिक्त दो पीएचडी सीटें बढ़ जाएंगी। 50 पदोन्नति होने पर 100 अतिरिक्त पीएचडी सीटों की संभावित वृद्धि, लगभग 50 टीएसपी सुपरन्यूमेरी सीटों से जनजातीय क्षेत्र के विद्यार्थियों को अवसर, पदोन्नति होने वाले शिक्षकों के वेतन, एरियर, पेंशन व ग्रेच्युटी में आर्थिक लाभ, विभागाध्यक्ष, डीन जैसे नेतृत्व पदों की संभावना, शोध परियोजनाओं व पीएचडी सुपरविजन में विस्तार, मनोबल, कार्य संतोष और उत्पादकता में वृद्धि, विश्वविद्यालय की रैंकिंग, शोध आउटपुट और शैक्षणिक गुणवत्ता में सुधार। देरी से न केवल शिक्षकों में असंतोष बढ़ता है, बल्कि छात्र और शोधार्थी भी अवसरों से वंचित हो जाते हैं।


