हल्दीघाटी-रक्त तलाई संरक्षण पर केंद्र-राज्य सरकार को हाईकोर्ट की फटकार:ऐतिहासिक धरोहर की दुर्दशा पर जताई नाराजगी, कहा- जिम्मेदार विभाग पेश करे शपथ पत्र

राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने हल्दीघाटी दर्रे और रक्त तलाई जैसे ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और रखरखाव में हो रही गंभीर लापरवाही पर सख्त रुख अपनाते हुए केंद्र और राज्य सरकार को फटकार लगाई है। एक्टिंग चीफ जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस डॉ. नूपुर भाटी की खंडपीठ ने 16 फरवरी को हुई सुनवाई में केंद्र और राज्य सरकार के जवाबदेह अधिकारियों को निर्देश दिए हैं कि वे पूर्व में जारी आदेशों की पालना पर विस्तृत शपथ पत्र पेश करें। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महाराणा प्रताप के शौर्य के प्रतीक इन स्थलों का वर्तमान स्वरूप प्रशासनिक उदासीनता के कारण नष्ट हो रहा है। दरअसल, कोर्ट के संज्ञान में यह बात आई है कि ऐतिहासिक रूप से संकरा रहने वाला हल्दीघाटी दर्रा, जहां से कभी केवल दो घोड़े एक साथ गुजर सकते थे, उसे वर्ष 2019 में नियमों को ताक पर रखकर 40 मीटर चौड़े डबल-लेन हाईवे में बदल दिया गया। इस प्रक्रिया में 200 से अधिक पेड़ों की कटाई की गई और पहाड़ियों को समतल कर दिया गया, जिससे पुरातात्विक अवशेषों के दबने और पहाड़ियों के ढहने का खतरा पैदा हो गया है। इसके बाद कोर्ट ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया था। केंद्र और राज्य सरकार के कई विभाग तलब हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकार के कई महत्वपूर्ण विभागों को पक्षकार बनाया है। इन्हें जारी नोटिस के बाद संस्कृति मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, पुरातत्व विभाग और एनएचएआई, मुख्य सचिव, पर्यटन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और उदयपुर कलेक्टर आदि को शामिल किया गया था। कोर्ट ने सभी प्रतिवादियों को 16 दिसंबर 2025 को दिए गए निर्देशों की पालना पर बिंदुवार हलफनामा देने को कहा। रक्त तलाई में गंदगी और अतिक्रमण का अंबार ऐतिहासिक स्थल रक्त तलाई की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए कोर्ट ने पाया कि जिस मैदान को कभी शहीदों के खून से भीगा माना जाता था, वहां आज झाड़ियां उगी हुई हैं और शराब की टूटी बोतलें बिखरी पड़ी हैं। यहां तंवर शहीदों की छतरी और महाराणा प्रताप के वफादार सेनापति हकीम खान सूर की मजार उपेक्षित है। इसके अलावा, तलाई की जमीन पर सरकारी स्कूल और अस्पताल जैसी सार्वजनिक संरचनाओं के निर्माण और अवैध बस्तियों से निकलने वाले सीवेज के कारण यहां हर वक्त दुर्गंध फैली रहती है। कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में स्पष्ट किया कि इन स्थलों की उपेक्षा केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि संवैधानिक प्रावधानों का भी गंभीर उल्लंघन है: साथ ही, कोर्ट ने ‘प्राचीन स्मारक और पुरातत्व स्थल अवशेष अधिनियम, 1958’ और विभिन्न पर्यावरण संरक्षण कानूनों के उल्लंघन पर भी नाराजगी जताई है। हाईकोर्ट के अंतरिम निर्देश मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित अंतरिम आदेश जारी किए थे, जिनकी पालना रिपोर्ट अब तलब की गई है: कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया है कि 2024 के बजट में घोषित 100 करोड़ रुपये के ‘महाराणा प्रताप टूरिस्ट सर्किट’ का काम अब तक धरातल पर क्यों नहीं उतरा और इसकी डीपीआर की वर्तमान स्थिति क्या है। कोर्ट की सहायता के लिए वकील लक्ष्य सिंह उदावत, तानिया तुली और यशवी खंडेलवाल को न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) नियुक्त किया गया है।

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