सुप्रीम कोर्ट ने आज एक अंतरिम आदेश जारी करते हुए छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों के दफनाए गए शवों को जबरन कब्र से निकालकर दूसरे स्थान पर दफनाने की कार्रवाई पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने साफ कहा कि अगली सुनवाई तक किसी भी दफनाए गए शव को कब्र से बाहर नहीं निकाला जाएगा। ये आदेश जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने दिया। मामला एक जनहित याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से अंतरिम राहत की मांग की गई थी। उन्होंने कोर्ट को बताया कि राज्य प्रशासन कथित रूप से शवों को हटाने की कार्रवाई का समर्थन कर रहा है। इस पर पीठ ने कहा, फिलहाल दफनाए गए शवों को आगे और नहीं निकाला जाएगा।
क्या था पूरा मामला याचिका में कहा गया है कि छत्तीसगढ़ में आदिवासी ईसाइयों को अपने गांव की सीमा के भीतर अपने मृत परिजनों को दफनाने से रोका जा रहा है, जबकि दूसरे अन्य समुदायों को ऐसा करने की अनुमति है। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कुछ मामलों में उनके परिजनों के शवों को उनकी जानकारी के बिना कब्र से निकाल लिया गया और गांव से दूर दूसरी जगह दफनाने की कोशिश की गई। वरिष्ठ अधिवक्ता कॉलिन गोंजाल्विस ने अदालत में कहा कि राज्य प्रशासन कथित रूप से इस कार्रवाई का समर्थन कर रहा है। इसी पर अदालत ने अंतरिम राहत देते हुए रोक लगाने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट का साफ निर्देश सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अभी के लिए दफनाए गए शवों को और नहीं निकाला जाएगा। यानी जब तक अंतिम फैसला नहीं आता, तब तक किसी भी तरह की जबरन खुदाई या शवों को स्थानांतरित करने की कार्रवाई नहीं हो सकती। मामला संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर किया गया है, जिसमें मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया है। पुराने फैसले का हवाला याचिका में यह भी कहा गया है कि एक पुराने मामले के फैसले का हवाला देकर पुलिस कार्रवाई कर रही है। मामला था रमेश बघेल बनाम स्टेट ऑफ छत्तीसगढ़ का, इसमें एक ईसाई व्यक्ति ने अपने पिता, जो एक पादरी थे, उनके शव को अपने मूल गांव चिंडवाड़ा के कब्रिस्तान या अपनी निजी कृषि भूमि में दफनाने की अनुमति मांगी थी। उस मामले में न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने निजी जमीन पर दफनाने की अनुमति दी थी, जबकि न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा ने कहा था कि दफन केवल उस स्थान पर किया जा सकता है जो ईसाइयों के लिए निर्धारित है, जो कथित तौर पर कर्कापाल गांव में है और मूल गांव से लगभग 20-25 किलोमीटर दूर बताया गया। याचिका में गांव के भीतर ही कफन-दफन की अनुमति देने की मांग की गई है। इसी पृष्ठभूमि में दायर वर्तमान जनहित याचिका में अदालत से यह घोषणा करने की मांग की गई है कि धर्म, जाति या अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति या अन्य पिछड़ा वर्ग की स्थिति की परवाह किए बिना हर व्यक्ति को अपने गांव में अपने मृत परिजनों को दफनाने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। याचिका में यह भी मांग की गई है कि राज्य की सभी ग्राम पंचायतों को निर्देश दिया जाए कि वे हर गांव में सभी समुदायों के लिए दफनाने की जगह चिन्हित करें और वहां अंतिम संस्कार की अनुमति दें।
कांकेर में दफन को लेकर भड़की थी हिंसा छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले के आमाबेड़ा क्षेत्र के बड़े तेवड़ा गांव में शव दफनाने को लेकर पहले भी गंभीर विवाद हो चुका है। यह मामला तब तूल पकड़ गया था, जब गांव के सरपंच रजमन सलाम ने अपने पिता चमरा राम के निधन के बाद उनका शव गांव की बाड़ी में दफना दिया। बताया गया कि सरपंच का परिवार धर्म परिवर्तन कर चुका था, जिससे गांव के कुछ लोगों में नाराजगी थी। इसी मुद्दे ने धीरे-धीरे तनाव का रूप ले लिया। तनाव इतना बढ़ गया कि आदिवासी समुदाय और मसीही (धर्मांतरित) समुदाय आमने-सामने आ गए। तीन दिनों तक इलाके में लगातार तनाव बना रहा और हालात हिंसक हो गए। बड़े तेवड़ा और आमाबेड़ा इलाके में बने तीन चर्च और प्रार्थना भवनों में आगजनी, पत्थरबाजी और तोड़फोड़ की घटनाएं हुईं। गुस्साई भीड़ ने सरपंच के घर में भी तोड़फोड़ की। स्थिति संभालने पहुंची पुलिस भी हिंसा की चपेट में आ गई। पथराव और झड़प के दौरान एडिशनल पुलिस अधीक्षक, पुलिस उपमहानिरीक्षक, उपनिरीक्षक, सहायक उपनिरीक्षक समेत 25 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए। हालात इतने बिगड़ गए थे कि हजारों की भीड़ आमाबेड़ा तक पहुंच गई और वहां भी एक चर्च में आग लगा दी गई। बताया गया कि भीड़ तीसरे चर्च की ओर भी बढ़ रही थी, जिसे समय रहते रोका गया। इस पूरी घटना ने राज्य में शव दफनाने के अधिकार और समुदायों के बीच बढ़ते तनाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए थे। अब सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले की पृष्ठभूमि में कांकेर की यह घटना भी अहम मानी जा रही है, क्योंकि विवाद की जड़ में शव को गांव में दफनाने का मुद्दा ही था।


