बेर की शॉर्ट-टर्म खेती, 3 महीने में लाखों की कमाई:जयपुर के 10वीं पास किसान ने लगाए 200 पेड़; रोजाना 600 Kg उत्पादन

बेर जंगली पेड़ है। राजस्थान में इस कंटीली झाड़ी पर लगने वाले मीठे बेर कभी चरवाहों के फल माने जाते थे। लेकिन अब कई किसान फार्म हाउस में बेर के बगीचे लगाकर शॉर्ट टर्म खेती कर रहे हैं। बेर का सीजन जनवरी से मार्च-अप्रैल तक होता है। इन तीन महीनों में बेर की काफी डिमांड रहती है। किसान अब फल-सब्जियों के साथ बेर की खेती भी कर रहे हैं। जयपुर के चौमूं कस्बे में बेर की बंपर खेती की जा रही है। चौमूं का पानी मीठा है। ऐसे में यहां की फल सब्जियां अपने स्वाद के लिए जानी जाती हैं। चौमूं का बेर भी अपनी मिठास के कारण राजस्थान, दिल्ली-हरियाणा और नेपाल तक पहुंचता है। चौमूं के 10वीं पास किसान दंपती ने बेर की शॉर्ट-टर्म खेती को अपनाया है। जिस तरह की डिमांड है उससे अनुमान है कि 3 महीने के सीजन में उनकी कमाई 8 लाख तक हो जाएगी। म्हारे देस की खेती में इस बार बात चौमूं के बेर किसान भंवरलाल सैनी की…. चौमूं के किसान भंवरलाल पापटवाण दसवीं तक पढ़े हैं। वे और उनकी पत्नी अनिता सब्जियों व अनाज की खेती करते हैं। एक्सट्रा इनकम के लिए उन्होंने खाली जमीन पर बेर के 200 पेड़ लगाए थे। अब इन पेड़ों से रोजाना 600 किलो प्रोडक्शन हो रहा है। चौमूं का मीठा पानी न केवल हरी सब्जियों के लिए फायदेमंद है, बल्कि यहां के बेर को भी खास बनाता है। इस कारण चौमूं के बेर डिमांड में रहते हैं। चौमूं उपखंड में भंवरलाल जैसे कई किसानों ने बेर के बगीचे लगाए हैं। किसान भंवरलाल ने बताया- बेर का सीजन जनवरी के अंत से शुरू हो जाता है। यह मार्च-अप्रैल तक चलता है। बेर के पेड़ों में साल में एक बार इसी सीजन में फल आता हैं। बेर के पेड़ को सिंचाई की जरूरत नहीं है। झाड़ी प्रजाति का होने के कारण यह कम पानी में भी कई दशकों तक प्रोडक्शन देता रहता है। बेर की पत्तियां चारे के रूप में काम आती हैं। भंवरलाल ने बताया- राजस्थान, दिल्ली और नेपाल तक शिवरात्रि के सीजन में बेर की डिमांड काफी बढ़ जाती है। फागुन का महीना चल रहा है। बेरों के पेड़ फलों से लदे हैं। शिवरात्रि का पर्व करीब होने के कारण मार्केट से काफी डिमांड आ रही है। महाशिवरात्रि के पर्व पर भोलेनाथ की पूजा में बेर काम में लिया जाता है। ऐसे में शिवरात्रि तक बेर के भाव लगातार बढ़ेंगे। जो बेर इस वक्त 25 से 30 रुपए प्रति किलो तक बिक रहा है, वह 50 से 60 रुपए किलो तक पहुंच जाता है। अभी पीक सीजन है। ऐसे में हमारी दिनचर्या बेर झाड़ने से शुरू होती है। परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य बेर झाड़कर चुनने का काम करते हैं। इसके बाद बेर इकट्‌ठा कर इनकी पैकिंग की जाती है और मार्केट में सप्लाई की जाती है। रोजाना 600 किलो से ज्यादा बेर इकट्‌ठा हो जाता है। 28 रुपए थोक भाव के हिसाब से रोजाना 16-17 हजार का बेर बेच देते हैं। इसमें शुद्ध कमाई होती है। भंवरलाल ने बताया- इस काम में पत्नी अनिता देवी भी खेती के काम में पूरा साथ देती हैं। रोजाना 7 घंटे बेर तोड़ने और इकट्‌ठे करने का काम किया जाता है। एक पेड़ से सीजन में 300 किलो पैदावार भंवरलाल ने बताया- सीजन में एक पेड़ से 200 से 300 किलो तक पैदावार हो जाती है। यहां से मंडी में रोजाना 600 किलो बेर सप्लाई कर रहे हैं। चौमूं का बेर जयपुर, दिल्ली की मंडियों में जाता है। वहां से यह हरियाणा, गुजरात, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, और काठमांडू (नेपाल) तक जाता है। बेर के जैम और अन्य प्रोडक्ट बनाने वाली कंपनियां भी बेर की डिमांड करती हैं। इस बार अच्छी पैदावार होने और ठीक भाव मिलने से किसानों के चेहरे खिले हुए हैं। चौमूं उपखंड के दर्जनभर गांवों में इस वक्त बेर की बंपर पैदावार हो रही है। बेर के पेड़ को यूं तो ज्यादा देखभाल की जरूरत नहीं पड़ती, लेकिन कीड़ों से बचाव जरूरी है। समय समय पर गोबर की खाद डाली जाती है। सीजन में पूरा परिवार करता है मेहनत भंवरलाल ने बताया- मेरे पिता हनुमान सैनी परंपरागत खेती करते हैं। चौमूं मंडी में हमारी दुकान भी है। हम सब्जियों और अनाज की खेती करते हैं। लेकिन जनवरी से मार्च तक का सीजन हमारे लिए खास होता है। इस समय बेर से एक्स्ट्रा इनकम होती है। मां बिरदी देवी भी खेती का काम संभाल लेती हैं। मैं तीन भाइयों में सबसे छोटा हूं। परिवार में 6 बहनें भी हैं। मेरी दो बेटियां और दो बेटे हैं। बेटा बीएससी एलएलबी कर रहा है। छोटा 8वीं क्लास में है। एक बेटी बीएससी नर्सिंग कर रही है और दूसरी 11वीं पढ़ती है। यह भी पढ़ें भीलवाड़ा की MBA लेडी किसान, जैविक खेती से कमाए लाखों:कोरोना में पिता की कपड़ा फैक्ट्री बंद हुई; वॉट्सऐप ग्रुप बनाकर बेची सब्जियां राजस्थान का भीलवाड़ा जिला कपड़ों के बिजनेस के लिए जाना जाता है। भीलवाड़ा शहर की 28 साल की युवती ने मास्टर्स इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (एमबीए) करने के बाद पिता के कपड़ों के व्यापार में हाथ आजमाया। लेकिन, कोरोना में कपड़ा फैक्ट्री बंद हो गई। ऐसे में युवती ने जैविक खेती को बिजनेस की तरह किया और कामयाब हो गई। (पढ़ें पूरी खबर)

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