छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बुधवार को भस्म बुधवार के अवसर पर विभिन्न गिरजाघरों में विशेष आराधनाएं आयोजित की गईं। इसके साथ ही मसीही समुदाय के 40 दिन के उपवास और संयम काल, जिसे चालीसा काल कहा जाता है, की शुरुआत हो गई। आराधना के दौरान श्रद्धालुओं के माथे पर खजूर की डालियों की भस्म लगाई गई, जो पश्चाताप और मनुष्य की नश्वरता का प्रतीक मानी जाती है। इस अवधि में सादा जीवन, प्रार्थना, उपवास और दान पर विशेष जोर दिया जाएगा। रायपुर आर्च डायसिस के आर्च बिशप विक्टर हैनरी ठाकुर ने समाजजनों से अपील की कि वे इस पवित्र काल में ईश्वर से पाप क्षमा और हृदय परिवर्तन की प्रार्थना करें। उन्होंने कहा कि यह समय आत्मचिंतन और आत्मशुद्धि का अवसर है। प्रार्थना, उपवास और दान के माध्यम से प्रभु यीशु के त्याग और बलिदान को स्मरण किया जाता है तथा सरल, सच्चे और आध्यात्मिक जीवन की ओर बढ़ने का संकल्प लिया जाता है। संयमित जीवन अपनाने का संदेश सेंट पॉल्स कैथेड्रल सहित अन्य चर्चों में आध्यात्मिक सेवकाई से जुड़े वक्ताओं और संचालकों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। उपवास काल में बचाई गई राशि जरूरतमंदों की सेवा में लगाने का संकल्प लिया गया है। छत्तीसगढ़ डायसिस की बिशप डॉ. सुषमा कुमार ने कहा कि यह काल परमेश्वर से दूर हुए लोगों के लिए वापसी का अवसर है। उन्होंने आत्मावलोकन, पश्चाताप और संयमित जीवन अपनाने का संदेश दिया। आगामी प्रमुख तिथियों में खजूर रविवार, दुख भोग सप्ताह का प्रारंभ, पवित्र शुक्रवार और पुनरुत्थान पर्व शामिल हैं। कैथोलिक, सीएनआई, बिलिवर्स, मनोनाइट, ऑर्थोडॉक्स और मारथोमा सहित विभिन्न संप्रदायों के चर्चों में इन अवसरों पर विशेष प्रार्थनाएं और आराधनाएं आयोजित की जाएंगी। पूरे संयम काल में विवाह संस्कार, जन्मदिन, विवाह वर्षगांठ और अन्य आनंद उत्सवों को सीमित रखते हुए सादगी, सेवा और प्रार्थना पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।


