भास्कर न्यूज | दंतेवाड़ा जिले का ऐतिहासिक और आस्था का प्रतीक फागुन मेला इस वर्ष 22 फरवरी से शुरू होकर 5 मार्च तक चलेगा। मुख्य मेला 4 मार्च को भरेगा, जिसमें हजारों श्रद्धालु और ग्रामीण देवी-देवताओं के साथ पहुंचेंगे। यह मेला दंतेश्वरी मंदिर परिसर में आयोजित होता है और इसकी शुरुआत बसंत पंचमी से आम के बौर की पूजा, त्रिशूल और खंभ गाड़ने की परंपरा के साथ हो चुकी है। होली के धुरेड़ी के बाद देवी-देवताओं की विदाई के साथ मेले का समापन होता है। मेले की सबसे खास बात यह है कि बस्तर संभाग के अलावा ओडिशा के गांवों से भी देवी-देवताओं के विग्रह यहां पहुंचते हैं। पिछले वर्ष 998 देवी-देवता मेले में शामिल हुए थे, जबकि इस बार मंदिर समिति ने 1000 से अधिक गांवों को आमंत्रण भेजा है। प्रतिदिन माता दंतेश्वरी का छत्र और छड़ी के साथ नगर भ्रमण होता है और गांव-गांव से आए देवी-देवता भी इसमें शामिल होते हैं। गौरमार, कोडरीमार, लम्हामार, चितलमार और गंवरमार जैसे पारंपरिक स्वांग मेले का प्रमुख आकर्षण होते हैं, जिन्हें देखने दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं। राजपरिवार की परंपरा आज भी कायम : फागुन मेले में दंतेवाड़ा का राजपरिवार पूरे परिवार के साथ शामिल होता है। राजपरिवार के सदस्य कमलचंद्र भंजदेव नगर भ्रमण कर परंपराओं का निर्वहन करते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिससे मेले का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व और बढ़ जाता है।
50 लाख से अधिक खर्च, चंद्रग्रहण के कारण 3 मार्च को विराम : मंदिर समिति ने बताया कि मेले के आयोजन पर इस बार 50 लाख रुपए से अधिक खर्च होने का अनुमान है। हालांकि 3 मार्च को चंद्रग्रहण होने के कारण इस दिन कोई धार्मिक कार्यक्रम नहीं होगा। 22 फरवरी को कलश स्थापना, 25 फरवरी को लम्हामार, 26 को कोडरीमार, 28 को गंवरमार, 2 मार्च को होलिका दहन और 4 मार्च को मुख्य मेला आयोजित होगा। 5 मार्च को देवी-देवताओं की विदाई के साथ ऐतिहासिक फागुन मेले का समापन होगा। देवी-देवताओं के लिए तैयार गए हैं विशेष तरह के कार्ड इस मेले की एक अनोखी परंपरा देवी-देवताओं के लिए बनाए गए विशेष कार्ड हैं, जो राशन कार्ड की तरह होते हैं। इस कार्ड में देवी-देवता का नाम, गांव, पुजारी और साथ आने वाले प्रतिनिधि का विवरण तथा फोटो दर्ज होती है। पुजारी कार्ड के साथ आधार कार्ड भी लेकर आते हैं, जिससे देवी-देवताओं की पहचान सुनिश्चित की जाती है।


