कानूनी अधिकार न होने से आदेश कागजी साबित:रेरा में सुनवाई तेज, आदेशों पर अमल मुश्किल उपभोक्ता आयोग में जाने को मजबूर ग्राहक

खरीदारों के बजाय बिल्डरों को मिल रही सहूलियत के चलते सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) के औचित्य पर ही सवाल उठाया है। छत्तीसगढ़ के संबंध में रेरा ने शिकायतों के निपटारे में उल्लेखनीय तेजी दिखाई है। प्रदेश में इसका केस डिस्पोजल रेट करीब 85% है, जो देश के बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में है। लेकिन जब रेरा के आदेशों पर अमल करने की बारी आती है, कानूनी अधिकार न होने से प्रक्रिया लंबी हो रही है। इस कारण शिकायतें के निपटारे के बाद आदेश पक्ष में आने पर भी खरीदारों को न्याय के लिए भटकना पड़ रहा है। कई ग्राहक अब भी उपभोक्ता आयोगों का रुख कर रहे हैं, जहां आदेशों के पालन के लिए स्पष्ट कानूनी अधिकार उपलब्ध हैं। ई-फाइलिंग और वर्चुअल सुनवाई की सुविधा ने ग्राहकों को सहूलियत भी दी है। दरअसल, रेरा एक्ट 2016 लागू होने के बाद से अब तक राज्य में 2092 प्रोजेक्ट रजिस्टर्ड हुए। 3882 शिकायतों में से 3201 का निपटारा हो चुका है, जबकि 17 फरवरी 2026 की स्थिति में केवल 681 मामले लंबित हैं। पर सबसे बड़ी चुनौती आदेशों के निष्पादन को लेकर सामने आ रही है। मौजूदा व्यवस्था में रेरा अपने आदेशों को सीधे लागू नहीं करा सकता। आदेश का उल्लंघन होने पर रेरा को जिला कलेक्टर के द्वारा कार्रवाई करवानी पड़ती है। इससे प्रक्रिया लंबी हो जाती है। रेरा को कार्रवाई का अधिकार मिले उपभोक्ता मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश भावनानी का कहना है कि रेरा की अपेक्षा उपभोक्ता आयोग में आदेशों का निष्पादन जल्दी होता है। यदि रेरा को आदेशों के सीधे क्रियान्वयन और दंडात्मक कार्रवाई के अधिकार मिल जाएं, तो व्यवस्था अधिक प्रभावी हो सकती है। रेरा को मजबूत बनाने का प्रस्ताव केंद्र में लंबित है। यदि ऐसा होता है, तो रेरा केवल सलाह देने वाला मंच नहीं, सशक्त नियामक संस्था बन सकता है। रेरा के पास अधिकार नहीं, आयोग से सीधी कार्रवाई रेरा का मुख्य उद्देश्य – सिर्फ रियल एस्टेट प्रोजेक्ट और बिल्डरों को रेगुलेट करना।
उपभोक्ता आयोग के दायरे में सभी प्रकार के उपभोक्ता विवाद, रियल एस्टेट शामिल।
कानूनी आधार – रियल एस्टेट (रेगुलेशन एंड डेवलपमेंट) एक्ट, 2016 के तहत आता है।
उपभोक्ता आयोग प्रोटेक्शन एक्ट-2019 में आता है।
मामलों का दायरा- प्रोजेक्ट में देरी, रजिस्ट्रेशन, वादे से मुकरना के केस में रेरा है।
उपभोक्ता आयोग- मुआवजा, खराब सेवा, अनुचित व्यापार व्यवहार पर निर्णय देता है।
राहत- प्रोजेक्ट पूरा कराना, ब्याज, रिफंड आदि रेरा के पास।
उपभोक्ता आयोग: मुआवजा, रिफंड, मानसिक क्षति का दावा निराकृत करता है।
निर्णय की गति – रेरा तकनीकी मामलों में तेज, लेकिन पालन में देरी संभव, जबकि उपभोक्त आयोग की प्रक्रिया लंबी हो सकती है, पर राहत व्यापक।
आदेश लागू कराने की शक्ति – आदेश के पालन के लिए प्रशासन पर निर्भरता। रेरा को कानूनी अधिकार की जरूरत है। इसका प्रस्ताव रेरा चेयरमैन के संगठन आल इंडिया फोरम ऑफ रेरा की ओर से केंद्र को दिया गया है। रेरा में कोई भी व्यक्ति महज 1000 रुपए के फीस पर ऑनलाइन केस फाइल कर सकता है। फाइलिंग के अधिकतम दो महीने में केस डिस्पोजल भी हो रहा है।
– संजय शुक्ला, चेयरमैन छत्तीसगढ़ रेरा

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