कोरोना में नौकरी छूटी, चिया की फसल ने बदली जिंदगी:सही बीज की तलाश में लगे 2 साल, अब 50 लाख की कमाई की उम्मीद

कभी टेक्सटाइल फैक्ट्री में मशीनों की फिटिंग करने वाला युवक आज चिया सीड की खेती से लाखों रुपए कमा रहा है। पांच साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। परिवार की खराब आर्थिक हालत के कारण ननिहाल में रहकर 8वीं तक पढ़ाई की। जब 13 साल के थे तो पढ़ाई भी छूट गई और फैक्ट्री में काम करने लग गए। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में टेक्सटाइल फैक्ट्रियों में करीब 17 साल तक नौकरी की। लेकिन कोरोना ने नौकरी भी छीन ली। गांव लौटकर खेती करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मध्यप्रदेश में नौकरी के दौरान देखी चिया की फसल दिमाग में थी। तीन साल तक बीजों को लेकर रिसर्च और ट्रायल किया। पिछले साल अक्टूबर में 84 हजार रुपए लगाकर 60 बीघा में चिया की फसल बो दी। उन्हें प्रति बीघा 4 क्विंटल उत्पादन से 50 लाख रुपए तक की कमाई होने का अनुमान है। म्हारे देश की खेती में आज बात नागौर के किसान गोपाल डूडी की… शुरुआत पारंपरिक खेती से की, लेकिन फायदा नहीं हुआ नागौर जिले के डेगाना क्षेत्र के बाजोली गांव के रहने वाले किसान गोपाल डूडी (36) ने बताया- कोरोना में नौकरी जाने के बाद गांव लौटा। खेती के अलावा कोई विकल्प नहीं था। पिता की 15 बीघा पुश्तैनी जमीन थी। वहीं नौकरी के दौरान मैंने करीब 45 लाख रुपए में 32 बीघा जमीन खुद की कमाई से खरीदी थी। कुल मिलाकर मेरे पास 47 बीघा जमीन हो गई थी। खेत में बोरवेल करवाया और सिंचाई के संसाधन जुटाने में करीब 30 लाख रुपए खर्च कर दिए। 2022 तक पारंपरिक खेती की, लेकिन तीन साल में सिर्फ खर्च ही निकल पाया। बचत नाम मात्र की रही। मैंने सोचा था कि पारंपरिक खेती से स्थिति सुधरने वाली नहीं है। मध्यप्रदेश में देखी चिया की खेती, यहीं से बदली सोच गोपाल डूडी ने बताया- नौकरी के दौरान मैंने मध्यप्रदेश में चिया की खेती देखी थी। उसकी पैदावार और मुनाफा देखकर मेरे मन में विचार आया था कि मुझे भी यह फसल करनी चाहिए। मैं खेतों में जाकर जानकारी लेता था। साल 2023 में स्थानीय कृषि अधिकारियों से बात कर चिया का बीज खरीदा और करीब दो बीघा में ट्रायल किया। लेकिन पूरी फसल खराब हो गई। बाद में समझ आया कि बीज हमारे क्लाइमेट के अनुसार नहीं था। दो साल की तलाश के बाद मिला सही बीज गोपाल डूडी ने बताया- अच्छे बीज के लिए मैं दो साल तक परेशान रहा। 2024 में बीकानेर के एक कृषि अधिकारी की मदद से 100 ग्राम बीज मिला। मैंने एक छोटी क्यारी में लगाया। इस बार परिणाम अच्छे रहे और मेरा मनोबल बढ़ा। जनवरी 2025 में कई बार मंदसौर (मध्य प्रदेश) गए। मैंने वहां खेती की तकनीक और क्लाइमेट को बारीकी से समझा। मंदसौर से लाया गया बीज राजस्थान के मौसम में सेट हो गया। 50 लाख आय का अनुमान गोपाल डूडी बताते हैं- 2025 में मैंने मंदसौर से 1200 रुपए प्रति किलो के हिसाब से 70 किलो बीज खरीदा। एक बीघा में एक किलो बीज की जरूरत होती है। मैंने 70 बीघा में लगाने का मानस बनाया था, लेकिन मां के कहने पर 60 बीघा में ही लगाया। रिस्क था, लेकिन मैंने हिम्मत दिखाई। 47 बीघा मेरे पास थी, बाकी 13 बीघा जमीन लीज पर ली। इस बार फसल बहुत अच्छी हुई है। एक बीघा में करीब 4 क्विंटल उत्पादन की संभावना है। 60 बीघा में करीब 240 क्विंटल चिया सीड्स का उत्पादन होगा। नीमच (मध्यप्रदेश) मंडी में इसका भाव 20 से 25 हजार रुपए प्रति क्विंटल है। अगर इस हिसाब से देखें तो करीब 50 लाख रुपए की आय का अनुमान है। 120 दिन में तैयार हो जाती फसल चिया तिलहन की फसल है। बुवाई का सही समय 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच होता है। यह फसल पाला सहन नहीं करती। ज्यादा पाला पड़ने पर नुकसान हो सकता है। इसके अलावा फसल में किसी प्रकार का रोग नहीं आता है। बुवाई से पहले जमीन में डीएपी खाद डालकर जुताई की। इसके खेत को समतल किया जाता है। 3-4 दिन जमीन को छोड़ दिया जाता है। फिर प्रति बीघा एक किलो बीज हाथ से छिड़का जाता है। पहली सिंचाई फव्वारे से की जाती है। दूसरी सिंचाई करीब 40 दिन बाद और उसके बाद हर 30 दिन में पानी देना होता है। करीब 120 दिन में फसल पककर तैयार हो जाती है। मार्च में कटाई होती है और बाद में मशीन से प्रोसेस किया जाता है। बीज के लिए एडवांस बुकिंग मेरी चिया की फसल देखने के लिए आसपास के गांवों से बड़ी संख्या में किसान आ रहे हैं। सभी में उत्साह है और लोग इस फसल को अपनाना चाहते हैं। बीज की एडवांस बुकिंग हो चुकी है, इसलिए इस बार मंडी जाने की जरूरत भी नहीं पड़ेगी। बीज की एडवांस बुकिंग के अनुसार बीज एक हजार रुपए किलो के हिसाब से भी जाएगा तो करीब 1 करोड़ रुपए की आय का अनुमान है। — खेती-किसानी से जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… इंजीनियर बनने का सपना टूटा,किन्नू से 21 लाख की कमाई:हिमालय के पानी ने बढ़ाया फ्रूट का टेस्ट, विदेशों में डिमांड, सबसे महंगी वाइन में इस्तेमाल इंजीनियर बनने का सपना अधूरा छूटा तो आर्ट्स से ग्रेजुएशन करना शुरू किया, लेकिन फिर पिता का निधन हो गया। पारिवारिक और खेती को संभालने की जिम्मेदारी में पढ़ाई ही छूट गई। पूरी खबर पढ़िए

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