सीजेआई जस्टिस सूर्यकांत ने युवा न्यायविदों को प्रेरक संदेश देते हुए कहा कि कानून को ‘किला’ नहीं बल्कि ‘मंच’ बनाना होगा, जहां विचारों का आदान-प्रदान हो, संवाद हो और समाज के बदलते स्वरूप के साथ न्याय व्यवस्था भी जीवंत बनी रहे। सीजेआई ने स्पष्ट किया कि किला स्थिरता का प्रतीक जरूर है, लेकिन कानून में संवेदनशीलता और गतिशीलता दोनों अनिवार्य हैं। सीजेआई जोधपुर में शनिवार को आयोजित नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के 18वें दीक्षांत समारोह में बोल रहे थे। इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश(CJI) जस्टिस सूर्यकांत मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। उन्होंने डिग्री प्राप्त करने वाले भावी अधिवक्ताओं और कानून विशेषज्ञों को संबोधित करते हुए न्याय की अवधारणा को बदलने का आह्वान किया। जस्टिस सूर्यकांत ने जोधपुर के ऐतिहासिक मेहरानगढ़ किले का उदाहरण देते हुए कहा कि जिस तरह एक किला सुरक्षा के लिए खड़ा रहता है, उसी तरह कानून को केवल समाज की रक्षा का ‘किला’ बनकर नहीं रहना चाहिए, बल्कि इसे एक ऐसे ‘मंच’ में तब्दील होना चाहिए, जहां हर व्यक्ति को अपनी बात कहने और अधिकार मांगने की जगह मिले। कानून का विकास: किले से मंच तक का सफर दीक्षांत भाषण ‘फ्रॉम फोर्ट्रेस टू फोरम – लॉ इन एन अनफिनिश्ड रिपब्लिक’ विषय पर केंद्रित था। जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि कानून का शुरुआती उद्देश्य समाज को अराजकता से बचाना था, जो एक किले की तरह सुरक्षा प्रदान करता था। लेकिन एक संवैधानिक लोकतंत्र में कानून की भूमिका इससे कहीं बड़ी है। उन्होंने जोर दिया कि कानून एक ऐसा स्थान होना चाहिए, जहां मतभेदों पर बहस हो, अधिकारों को स्पष्ट किया जाए और सत्ता के साथ तर्क किया जा सके। उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि मेहरानगढ़ अपनी शक्ति की याद दिलाता है, लेकिन एक किला स्थिर रहता है, जबकि एक मंच भागीदारी से जीवंत होता है। आपकी वकालत दरवाजे खोलने वाली होनी चाहिए, न कि दीवारें खड़ी करने वाली। न्याय की सुलभता और बदलती चुनौतियां चीफ जस्टिस ने न्यायपालिका के सामने मौजूद आधुनिक चुनौतियों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि आज के युग में कानून केवल अदालतों तक सीमित नहीं है। तकनीकी प्रगति, जलवायु परिवर्तन और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच न्याय की परिभाषा विस्तृत हुई है। उन्होंने भावी कानूनविदों को सचेत किया कि वे कानून को केवल एक पेशा न समझें, बल्कि इसे सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाएं। उन्होंने कहा कि कानून तब तक सफल नहीं है, जब तक वह समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लिए सुलभ न हो। छात्रों के अनुभव और भविष्य की जिम्मेदारी समारोह के दौरान ग्रेजुएशन पूरी करने वाले छात्रों के प्रति स्नेह जताते हुए उन्होंने कहा कि यूनिवर्सिटी में बिताए गए साल केवल डिग्रियां हासिल करने के लिए नहीं थे, बल्कि यह उनके पेशेवर स्वभाव के निर्माण की प्रक्रिया थी। उन्होंने छात्रों द्वारा आयोजित किए जाने वाले आयोजनों जैसे एनएच-65 और ‘युवर्धा’ का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे ये अनुभव उन्हें एक बेहतर मध्यस्थ और वार्ताकार बनाते हैं। पेरेंट्स, परिजन और फैकल्टी का योगदान समारोह के अंत में जस्टिस सूर्यकांत ने डिग्री धारक छात्रों के माता-पिता और परिजनों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि आज की इस उपलब्धि के पीछे उनके परिवारों का मूक त्याग और शिक्षकों का अटूट समर्पण है। उन्होंने फैकल्टी की सराहना करते हुए कहा कि उनके मार्गदर्शन ने ही इन युवा मस्तिष्क को भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार किया है। उन्होंने स्नातक होने वाले बैच से उम्मीद जताई कि वे कानून को अधिक सुलभ बनाएंगे और समाज में न्याय के खुले मंच के वास्तुकार के रूप में कार्य करेंगे।


